सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में लंबित आपराधिक अपील के निपटारे में इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से हुई 41 वर्षों की असाधारण देरी पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने इसे न्याय व्यवस्था के लिए चिंताजनक स्थिति बताया और लंबित मामलों के समाधान के लिए नवाचार पर विचार करने की जरूरत पर जोर दिया।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या न्याय प्रणाली को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। मामला विजय सिंह से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 1983 में भाई की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। तब उनकी उम्र 28 साल थी। कानपुर की सेशन अदालत ने दिसंबर, 1985 में उन्हें दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन मामला लगभग 41 वर्षों तक लंबित रहा और इस वर्ष 9 फरवरी को हाईकोर्ट ने इसे खारिज किया।
वृद्धावस्था तक दोषसिद्धि के साये में जीने को रहा मजबूर
- याचिकाकर्ता विजय सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वह अब 72 वर्ष के हो चुके हैं और युवावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक इस आपराधिक दोषसिद्धि के साये में जीने को मजबूर रहे हैं।
- उन्होंने कहा, उनकी अपील चार दशकों तक हाईकोर्ट में लंबित रही, जिससे उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ा।
तीन महीने जेल में रहे...43 वर्ष से जमानत पर
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया कि विजय सिंह सिर्फ तीन महीने जेल में रहे और उसके बाद करीब 43 वर्षों तक जमानत पर रहे, जबकि उनकी अपील लंबित रही। पीठ ने उनकी जमानत को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी रहने तक बरकरार रखा है। पीठ ने कहा, यह स्थिति बार-बार सामने आ रही है, जहां लंबित मामलों के चलते पक्षकार समय पर न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करने को मजबूर हैं।
वकीलों से मांगे सुझाव
- सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या के समाधान के लिए वरिष्ठ वकीलों से सुझाव भी मांगे। इस पर वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने सुझाव दिया कि तीन दशक से अधिक समय से लंबित अभियोजन अपीलों को खारिज कर दिया जाए, ताकि लंबित मामलों का बोझ कम किया जा सके।
- पीठ ने सुझाव खारिज करते हुए कहा, सिर्फ देरी के आधार पर मामलों का निपटारा न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा। ऐसा कदम सार्वजनिक हित को नुकसान पहुंचा सकता है और पक्षकारों को पक्ष रखने के मौके से वंचित कर सकता है।
यह न्याय से इन्कार करने जैसा
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इस तरह की देरी न्याय से इन्कार करने जैसी बात है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत तेजी से सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है।
- पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार से 30 साल से अधिक समय से लंबित सभी आपराधिक अपीलों की रिपोर्ट मांगी, जिसमें केस नंबर और देरी की वजहें शामिल हों।
- राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड (एनजेडीजी) के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट में 10.3 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें 3.1 लाख आपराधिक अपीलें शामिल हैं, यह देश के सभी उच्च न्यायालयों में सबसे अधिक हैं।