जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने कहा, कई बार ऐसी स्थिति में कम कठोर मामले में आरोपियों के बरी किए जाने का फायदा गंभीर अपराधों के आरोपी उठा लेते हैं। पीठ ने कहा, हमने यह भी देखा है कि कई बार समन्वय की कमी के कारण एक संबंधित अपराध के लिए दायर मामले में एक आरोपी अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत अपर्याप्त सबूतों और अदालत को उचित सहायता प्रदान नहीं करने के कारण बरी हो जाता है।
ऐसी स्थिति में मुख्य मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से कमियां रह जाती हैं। पीठ ने दो भाइयों की हत्या के एक मामले और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अन्य अपराधों में एक आरोपी विशाल को इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली जमानत को रद्द करते हुए यह आदेश दिया है।
यूपी के गृह सचिव अभियोजन निदेशालय को बनाएं संवेदनशील
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गृह सचिव को अभियोजन निदेशालय को संवेदनशील बनाने और सुव्यवस्थित करने के लिए तत्काल उपचारात्मक उपाय करने का निर्देश दिया। दरअसल, इस मामले में पीठ ने पाया कि आरोपी पर शस्त्र अधिनियम और गैंगस्टर अधिनियम के तहत अपराधों के लिए अलग से मुकदमा चलाया गया था। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के गृह सचिव को भेजने का निर्देश दिया।
दोहरे हत्याकांड में दो साल के अंदर जमानत देने पर भी जताई नाराजगी
दोहरे हत्याकांड की इस गंभीर घटना के दो साल के भीतर जमानत दिए जाने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में एक अन्य आरोपी के जमानत रद्द करने के उसके पिछले आदेश को हाईकोर्ट के संज्ञान में नहीं लाया गया था। हाईकोर्ट ने मुकदमे के समापन में अनिश्चितता, पुलिस की एकतरफा जांच, आरोपी पक्ष के मामले की अनदेखी जैसे कारकों पर ध्यान दिया था। हाईकोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया था कि विचाराधीन कैदी होने के कारण अभियुक्त संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई का हकदार है।