सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से पूछा कि सेना में 'एक रैंक एक पेंशन' (ओआरओपी) को रक्षा मंत्री की ओर से संसद में सैद्धांतिक मंजूरी देने के बाद, क्या वह भविष्य में पेंशन में होने वाली किसी भी बढ़ोतरी के स्वत: लागू होने के फैसले से पीछे हट गई है। शीर्ष अदालत ने यह भी पूछा कि क्या वह पेंशन की हर पांच साल में होने वाली समीक्षा को बदलकर सालाना स्वत: समीक्षा की व्यवस्था पर विचार कर सकती है।
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने ये सारे सवाल केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एन वेंकटरमण के सामने रखे। वेंकटरमण सात नवंबर 2015 को इस बारे में जारी अधिसूचना को न्यायोचित ठहरा रहे थे, जिसमें पांच साल में पेंशन की समीक्षा का फैसला किया गया था।
शीर्ष अदालत में इंडियन एक्स सर्विसमैन मूवमेंट ने याचिका दायर कर सात नवंबर 2015 की अधिसूचना को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील हजीफा अहमदी ने कहा कि यह फैसला मनमाना और दुर्भावनापूर्ण है, जो वर्ग के अंदर वर्ग खड़ा करता है और एक रैंक कई पेंशन को स्वीकृति देता है।
संसद में मंत्री का बयान कानून नहीं
वेंकटरमण ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में साफ किया है कि मंत्री द्वारा संसद में दिया गया बयान कानून नहीं है। जहां तक भविष्य में पेंशन मेें होने वाली बढ़ोतरी को सालाना आधार पर स्वत: लागू करने का सवाल है तो यह किसी भी तरह की सेवा में लागू करना विचार योग्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि 2015 का फैसला नीतिगत निर्णय है, जो सभी पक्षकारों से बातचीत के बाद लिया गया है।
नीतिगत निर्णय को छेड़ा नहीं जा सकता
वेंकटरमण ने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में यह भी साफ कहा है कि कोई भी नीतिगत निर्णय यदि स्पष्ट रूप से मनमाना और दुर्भावनापूर्ण न हो तो उसे छेड़ा नहीं जा सकता। 2015 का फैसला संघीय सरकार का फैसला है और नीतिगत निर्णय लेना आसान नहीं होता। सामाजिक आर्थिक स्थिति, राजनीति, सायकोलॉजी और बजट जैसी कई बातों पर विचार करना होता है। एएसजी ने कहा, याचिकाकर्ता चाहते हैं कि ओआरओपी के लिए आधार वर्ष 2014 के बदले 2013 किया जाए लेकिन इस मांग का कोई अंत नहीं है। कल को कोई समूह इसे 2015 करने की मांग कर सकता है।