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SC: सुप्रीम कोर्ट का AIIMS को निर्देश, शख्स को निष्क्रिय इच्छामृत्यु के विकल्प पर विचार के लिए गठित करें बोर्ड

Thu, 11 Dec 2025 10:23 PM IST
देवेश त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र हरीश राणा 2013 में अपने पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इसके बाद से ही वह कोमा जैसी स्थिति में हैं। सुप्रीम कोर्ट उनके पिता की ओर से दायर निष्क्रिय इच्छामृत्यु देने की याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एम्स को 31 वर्षीय शख्स के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु के विकल्प पर विचार करने के लिए एक बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 13 वर्षों से कोमा जैसी हालत से जूझ रहे 100 फीसदी विकलांगता (क्वाड्रिप्लेजिया) वाले शख्स को इस तरह से पीड़ित रहने नहीं दे सकती है। 

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अदालत ने एम्स को शख्स की स्थिति की जांच करने और इस पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए एक बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया कि क्या निष्क्रिय इच्छामृत्यु के तहत जीवन रक्षक उपचार को रोका जा सकता है।

क्या होती है निष्क्रिय इच्छामृत्यु?
निष्क्रिय इच्छामृत्यु में किसी मरीज को जानबूझकर मरने देने के लिए जीवन रक्षक उपकरण या जीवन को बनाए रखने के लिए आवश्यक उपचार को रोक दिया जाता है या वापस ले लिया जाता है। नोएडा के एक अस्पताल के प्राथमिक बोर्ड की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट की जांच करने वाली न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा, 'यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। लड़के की हालत दयनीय नजर आती है।'
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'हमें अब कुछ करना होगा' :सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया कि डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बेडसोर (लगातार लेटे रहने से होने वाले घाव) बेहद दर्दनाक होने के कारण हरीश राणा के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। अदालत ने कहा, 'हमें अब कुछ करना होगा। हम उन्हें इस हालत में जीने नहीं दे सकते। यह निश्चित है।'

इसमें कहा गया है कि जब कोई मरीज कोमा जैसी स्थिति में होता है और उसे बिस्तर से घाव हो जाते हैं, तो इसका मतलब है कि उसकी ठीक से देखभाल नहीं की गई है और उसकी स्वच्छता बहुत खराब है। जस्टिस परदीवाला ने कहा, 'बेडसोर सब कुछ खत्म कर देते हैं। अब इन्हें रोकने के लिए वाटरबेड आदि मौजूद हैं। ये बेहद दर्दनाक होते हैं। डॉक्टरों ने साफ-साफ कहा है कि ठीक होने का कोई सवाल ही नहीं उठता।'

मरीज के पिता की वकील ने दी क्या दलील?
मरीज के पिता की ओर से पेश हुईं अधिवक्ता रश्मी नंदकुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के अनुसार अगला कदम सीएमओ की ओर से गठित द्वितीयक बोर्ड को मामले को रिपोर्ट करना है। उन्होंने कहा, 'इस मामले में प्राथमिक बोर्ड में पहले से ही सीएमओ की ओर से गठित पांच विशेषज्ञ मौजूद हैं, इसलिए द्वितीयक बोर्ड के संदर्भ की जरूरत नहीं है। अगला कदम उन्हें ऐसे अस्पताल में भर्ती कराना है जहां जीवन रक्षक उपकरण हटाया जा सके।'

पीठ ने कहा, 'ऐसी परिस्थितियों में अब हमें प्रक्रिया के अगले चरण की ओर बढ़ना चाहिए। हमें आदेश देना चाहिए कि रोगी की जांच के लिए एक द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड का गठन किया जाए। हम एम्स से अनुरोध करते हैं कि वह द्वितीयक बोर्ड का गठन करे और हमें अगले बुधवार तक रिपोर्ट दे।'

पिछले कुछ वर्षों में यह दूसरी बार है जब मरीज के माता-पिता ने अपने बेटे के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। गौरतलब है कि हरीश राणा पंजाब विश्वविद्यालय का छात्र था। 2013 में अपने पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से गिरने के बाद उसके सिर में चोटें आई थीं। तब से वह पूरी तरह से बिस्तर पर ही हैं।

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