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SC: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- फर्जीवाड़े के बाद भी खाताधारकों को क्यों दिया जाए सुनवाई का मौका? जानें पूरा मामला

Wed, 10 Dec 2025 05:14 AM IST
पवन पांडेय अमर उजाला ब्यूरो

सार

आरबीआई की 2024-2025 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 से 2025 तक बैंकिंग धोखाधड़ी और उसमें शामिल राशि का आंकड़ा देते हुए सॉलिसिटर जनरल ने कहा, 2022-23 में धोखाधड़ी की संख्या 13,494 और राशि 18,981 करोड़ रुपये थी। 2023-24 में 36,060 बैंक धोखाधड़ी के मामले थे, जिनमें 12,230 करोड़ रुपये शामिल थे और 2024-25 में मामले 23,953 जबकि राशि 36,014 करोड़ रुपये थी।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि उन बैंक खाताधारकों को व्यक्तिगत सुनवाई का मौका देने से क्या फायदा होगा जिनके खातों को 2017 में भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से तय नियमों के तहत उचित जांच-पड़ताल के बाद फ्रॉड घोषित किया गया था। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ मंगलवार को भारतीय स्टेट बैंक की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें इन खाताधारकों को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन करते हुए व्यक्तिगत सुनवाई का मौका देने के लिए कहा गया था।
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'व्यक्तिगत सुनवाई के मौके को कैसे उचित ठहरा सकते हैं?'
पीठ ने निजी कंपनी अमित आयरन प्राइवेट लिमिटेड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के परमेश्वर से कहा, व्यक्तिगत सुनवाई के मौके को कैसे उचित ठहरा सकते हैं, जबकि बैंक ने आरबीआई के सर्कुलर के अनुसार काम किया है। इस सर्कुरल के अनुसार बैंक ने उचित जांच पड़ताल के बाद आपको कारण बताओ नोटिस जारी कर लिखित रूप में अपनी बात रखने का अवसर प्रदान किया।

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एसबीआई की ओर से एएसजी ने रखी दलील
मामले की सुनवाई के शुरुआत में देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, व्यक्तिगत सुनवाई पर जोर देने से बैंकों और नियामक व्यवस्था की अखंडता को ठोस नुकसान पहुंचता है, जबकि उधार लेने वाले को तब तक कोई वास्तविक नुकसान नहीं होता जब तक उसे अपना मामला लिखित रूप में रखने और उस पर विधिवत विचार करने का पूरा और प्रभावी अवसर मिलता है। उन्होंने कहा, धोखाधड़ी की घोषणा से संबंधित परिपत्र (धोखाधड़ी पर मास्टर निर्देश, 2017) दो आवश्यक उद्देश्यों के लिए आवश्यक था - देश में बैंकिंग धोखाधड़ी की संख्या में स्पष्ट वृद्धि हुई है, जिसके लिए आरबीआई को हस्तक्षेप करने और पूरे बैंकिंग क्षेत्र द्वारा पालन की जाने वाली एक प्रणाली प्रदान करने की आवश्यकता है। साथ ही, किसी भी बैंक या बैंकिंग क्षेत्र पर किसी भी प्रभाव का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ता है; इसलिए, बैंकिंग क्षेत्र की वित्तीय मजबूती हमेशा एक प्रमुख विचारणीय बिंदु है। 

पांच साल बाद इस्तीफा देने या रिटायर होने वाले कर्मी ग्रेच्युटी के हकदार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी कर्मचारी जो इस्तीफा देता है या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का विकल्प चुनता है, वह ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत ग्रेच्युटी पाने का हकदार है। बशर्ते उसने कम से कम पांच साल की निरंतर सेवा पूरी कर ली हो। शीर्ष अदालत ने दिल्ली परिवहन निगम को अपीलकर्ता कर्मचारी (अब मृत) के परिवार को ग्रेच्युटी का भुगतान करने का निर्देश दिया, जिसने लगभग 30 साल सेवा की थी और पारिवारिक कारणों से इस्तीफा दे दिया था। सेवा से इस्तीफा देने के बाद उसे ग्रेच्युटी और पेंशन व अवकाश नकदीकरण जैसे अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित कर दिया गया था। ब्यूरो

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा अपीलकर्ता के कानूनी उत्तराधिकारी ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 की धारा 4 के अनुसार ग्रेच्युटी के भुगतान के हकदार हैं। इस धारा के अनुसार एक कर्मचारी जिसने पांच साल से कम सेवा नहीं की है, वह ग्रेच्युटी के भुगतान का हकदार होगा, इस तथ्य की परवाह किए बिना कि वह सेवानिवृत्त हो गया है या सेवा से इस्तीफा दे दिया है। पीठ ने आदेश में कहा, चूंकि प्रतिवादी-डीटीसी को ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम के आवेदन से छूट नहीं दी गई थी, इसलिए अपीलकर्ता के कानूनी उत्तराधिकारी उसकी ओर से दी गई सेवा के लिए 1972 अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार ग्रेच्युटी प्राप्त करने के हकदार हैं।

किसी मामले को बेवजह हाईकोर्ट में विचार के लिए भेजने से बचना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी मामले को अनावश्यक रूप से हाईकोर्ट में नए सिरे से विचार के लिए भेजने से बचना चाहिए। इससे मुकदमेबाजी का नया दौर शुरू हो जाता है। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि यह विचार मुकदमेबाजी को कम करने का है, न कि उसे बढ़ाने का। पीठ इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक मामले को सभी संबंधित पक्षों को सुनने के बाद नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया गया था।
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यह मामला प्राधिकारियों की ओर से राजस्व मानचित्र में सुधार के लिए एक व्यक्ति के आवेदन को खारिज करने से संबंधित था। पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। अपील पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि अदालत ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 30 की गलत व्याख्या की है, जो मानचित्र और फील्ड बुक के रखरखाव से संबंधित है। पीठ ने कहा कि इससे अनावश्यक रूप से आगे मुकदमेबाजी बढ़ सकती थी। पीठ ने आगे कहा, हम यह भी जोड़ना चाहेंगे कि इस न्यायालय का पूर्व मत यह था कि यदि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है, तो मामले को संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर प्रदान करने के लिए वापस किया जाना चाहिए। हालांकि, समय बीतने के साथ, यह मत बदल गया।


 
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