फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सीबीआई मामले में नाराज सुप्रीम कोर्ट, पूछा- क्या भ्रष्टाचार के आरोपी को एक मिनट भी पद पर रहना चाहिए

Fri, 30 Nov 2018 05:40 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन

केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) के अंदर मची आपसी खींचतान को लेकर सुप्रीम कोर्ट खासा नाराज है। पिछली बार गोपनीय जवाबों के लीक होने पर शीर्ष अदालत ने सुनवाई अचानक स्थगित कर दी थी। बृहस्पतिवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा के वरिष्ठ वकील फली एस. नरीमन से सवाल किया कि अगर सीबीआई निदेशक रंगे हाथ रिश्वत लेते पकड़े जाते हैं तो क्या किया जाना चाहिए? क्या ऐसी स्थिति में भी समिति से पूछने की जरूरत है। सवाल यह भी है कि क्या ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार के आरोपी को एक मिनट के लिए भी पद पर बने रहने देना चाहिए। 

विज्ञापन


कोर्ट के सवाल पर नरीमन ने कहा कि ऐसी स्थिति में भी सरकार को समिति के पास जाना चाहिए या अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए। सीबीआई निदेशक को नियुक्त और तबादला करने का अधिकार चयन समिति के पास है। चयन समिति में प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता होते हैं। 

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और केएम जोसेफ की पीठ के समक्ष केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि सीबीआई निदेशक को नियुक्त करने का अधिकार सरकार का है। चयन समिति को सिर्फ नामों की सिफारिश करने का अधिकार है। 
विज्ञापन


सीबीआई निदेशक का चुनाव चयन समिति करती है, लेकिन नियुक्त नियुक्ति संबंधी कैबिनेट कमेटी (सीसीए) करती है। ऐसे में समिति से सलाह कर निर्णय लेने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इस पर पीठ ने कहा कि अब अदालत पहले यह विचार करेगी कि आलोक वर्मा से उनके अधिकार छीने जाने के लिए पीएम के पैनल की मंजूरी अनिवार्य है या नहीं। मामले पर अगली सुनवाई 5 दिसंबर को होगी। 

अब भी सीबीआई निदेशक हैं आलोक वर्मा 

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि आलोक वर्मा अब भी सीबीआई निदेशक और सरकारी आवास में हैं। उनका स्टाफ भी वही है। यह कहना सही नहीं है कि उनका तबादला किया गया है। केंद्र का मुख्य मकसद सीबीआई पर लोगों का भरोसा बनाए रखना था। एजेंसी के दो वरिष्ठ अधिकारी एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगा रहे थे। 

इससे लोगों में नकारात्मक असर पड़ रहा था। लिहाजा, सरकार ने दखल देने का फैसला किया। उन्होंने याची आलोक वर्मा समेत अन्य के इस दावे को भी खारिज किया कि सीबीआई पर केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) का प्रभुत्व सिर्फ भ्रष्टाचार मामलों तक सीमित है। उन्होंने कहा कि सीवीसी अधिनियम में सभी मामलों की बात कही गई है।

पर कतरने जैसा है 23 अक्तूबर का निर्णय : नरीमन

आलोक वर्मा के वरिष्ठ वकील फली एस. नरीमन ने कहा कि केंद्र के कार्मिक विभाग (डीओपीटी) और सीवीसी का 23 अक्तूबर को लिया निर्णय सीबीआई निदेशक के पर कतरने जैसा है। दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (डीएसपीई) अधिनियम और सीवीसी एक्ट के तहत ऐसा नहीं किया जा सकता। 

विनीत नारायण मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए नरीमन ने कहा कि सीबीआई निदेशक का कार्यकाल दो वर्ष के लिए होता है। वर्मा को 1 फरवरी, 2017 को निदेशक बनाया गया था। बीच में सीबीआई निदेशक को नहीं हटाया जा सकता। 
विज्ञापन

किसने क्या कहा

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल (मल्लिकार्जुन खड़गे के वकील) : सीबीआई पर सीवीसी का प्रभुत्व महज भ्रष्टाचार के मामलों तक सीमित है। सीवीसी को सीबीआई निदेशक का दफ्तर सील करने और उन्हें छुट्टी पर भेजने का अधिकार नहीं है। नियुक्ति का अधिकार होने का मतलब निलंबन या बर्खास्त का अधिकार भी है। यह अधिकार चयन समिति को है। कल को ऐसा कैग, सीवीसी के साथ भी हो सकता है।

वरिष्ठ वकील राजीव धवन (सीबीआई अधिकारी एके बस्सी और अश्विनी गुप्ता के वकील) : ऐसा कोई नियम नहीं है कि सीबीआई निदेशक का निर्धारित दो वर्ष का कार्यकाल खत्म किया जाए। अगर डीएसपीई एक्ट में खामी है तो अदालत को इसे दूर करना चाहिए न कि सरकार या सीवीसी को। बस्सी और गुप्ता का तबादला इसलिए किया गया क्योंकि वे राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच कर रहे थे।

वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे (याची कॉमन कॉज के वकील) : बिना चयन समिति की अनुमति के आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें