अटॉर्नी जनरल ने कहा कि आलोक वर्मा अब भी सीबीआई निदेशक और सरकारी आवास में हैं। उनका स्टाफ भी वही है। यह कहना सही नहीं है कि उनका तबादला किया गया है। केंद्र का मुख्य मकसद सीबीआई पर लोगों का भरोसा बनाए रखना था। एजेंसी के दो वरिष्ठ अधिकारी एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगा रहे थे।
इससे लोगों में नकारात्मक असर पड़ रहा था। लिहाजा, सरकार ने दखल देने का फैसला किया। उन्होंने याची आलोक वर्मा समेत अन्य के इस दावे को भी खारिज किया कि सीबीआई पर केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) का प्रभुत्व सिर्फ भ्रष्टाचार मामलों तक सीमित है। उन्होंने कहा कि सीवीसी अधिनियम में सभी मामलों की बात कही गई है।
आलोक वर्मा के वरिष्ठ वकील फली एस. नरीमन ने कहा कि केंद्र के कार्मिक विभाग (डीओपीटी) और सीवीसी का 23 अक्तूबर को लिया निर्णय सीबीआई निदेशक के पर कतरने जैसा है। दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (डीएसपीई) अधिनियम और सीवीसी एक्ट के तहत ऐसा नहीं किया जा सकता।
विनीत नारायण मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए नरीमन ने कहा कि सीबीआई निदेशक का कार्यकाल दो वर्ष के लिए होता है। वर्मा को 1 फरवरी, 2017 को निदेशक बनाया गया था। बीच में सीबीआई निदेशक को नहीं हटाया जा सकता।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल (मल्लिकार्जुन खड़गे के वकील) : सीबीआई पर सीवीसी का प्रभुत्व महज भ्रष्टाचार के मामलों तक सीमित है। सीवीसी को सीबीआई निदेशक का दफ्तर सील करने और उन्हें छुट्टी पर भेजने का अधिकार नहीं है। नियुक्ति का अधिकार होने का मतलब निलंबन या बर्खास्त का अधिकार भी है। यह अधिकार चयन समिति को है। कल को ऐसा कैग, सीवीसी के साथ भी हो सकता है।
वरिष्ठ वकील राजीव धवन (सीबीआई अधिकारी एके बस्सी और अश्विनी गुप्ता के वकील) : ऐसा कोई नियम नहीं है कि सीबीआई निदेशक का निर्धारित दो वर्ष का कार्यकाल खत्म किया जाए। अगर डीएसपीई एक्ट में खामी है तो अदालत को इसे दूर करना चाहिए न कि सरकार या सीवीसी को। बस्सी और गुप्ता का तबादला इसलिए किया गया क्योंकि वे राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच कर रहे थे।
वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे (याची कॉमन कॉज के वकील) : बिना चयन समिति की अनुमति के आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।