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Supreme court: सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के भाजपा MLA की जमानत याचिका खारिज की, शिवा हत्याकांड में हैं आरोपी

Thu, 12 Feb 2026 06:30 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स - फोटो : अमर उजाला
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सुप्रीम कोर्ट ने अपराधी शिवप्रकाश उर्फ बिक्लू शिवा की हत्या के मामले में आरोपी बेंगलुरु के भाजपा विधायक बयराठी बसवराज की जमानत याचिका खारिज कर दी है। इसके बाद उनके आपराधिक जांच विभाग (सीआईडी) के समक्ष आत्मसमर्पण करने की संभावना है। बेंगलुरु स्थित सीआईडी कार्यालय के बाहर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है।

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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि विधायक ने मामले के मुख्य आरोपी से अपने संबंधों को लेकर गलत दावे किए हैं। अदालत ने कहा, “आप एक जनप्रतिनिधि हैं, आपको मुकदमे का सामना करने का साहस दिखाना चाहिए।”

इस घटनाक्रम के बाद सीआईडी ने तलाशी अभियान तेज कर दिया है। बसवराज के पास अब या तो जांच अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने या सक्षम अदालत में पेश होकर विधायकों/सांसदों की विशेष अदालत में नियमित जमानत याचिका दाखिल करने का विकल्प है।
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इससे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने मंगलवार को उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। न्यायमूर्ति सुनील दत्त यादव की अध्यक्षता वाली पीठ ने पहले दी गई गिरफ्तारी से अंतरिम राहत को भी समाप्त कर दिया था। हाईकोर्ट के फैसले के बाद से सीआईडी विधायक की तलाश में जुटी हुई है। सूत्रों के मुताबिक बसवराज फरार बताए जा रहे हैं और उनकी किसी भी समय गिरफ्तारी संभव है।
 

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने केरल हाईकोर्ट के 7 अतिरिक्त न्यायाधीशों को दी स्थायी नियुक्ति की मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने गुरुवार को केरल हाईकोर्ट के सात अतिरिक्त न्यायाधीशों को स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यह निर्णय मुख्य न्यायाधीस जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में हुई कॉलेजियम की बैठक में लिया गया।

जिन न्यायाधीशों के नामों को मंजूरी दी गई है, उनमें जस्टिस अब्दुल हकीम मुल्लापल्ली अब्दुल अजीज, जस्टिस श्याम कुमार वडक्के मुदवक्कट, जस्टिस हरिशंकर विजयन मेनन, जस्टिस मनु श्रीधरन नायर, जस्टिस ईश्वरन सुब्रमणि, जस्टिस मनोज पुलम्बी माधवन और जस्टिस मरक्कापरम्बिल भार्गवन स्नेहलता शामिल हैं। कॉलेजियम की मंजूरी के बाद अब इन नियुक्तियों के लिए केंद्र सरकार की औपचारिक अधिसूचना जारी की जाएगी।

अदाणी के थर्मल प्लांट के बारे में केंद्र-यूपी का पक्ष सुने बिना आदेश नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में अदाणी समूह के प्रस्तावित थर्मल पावर प्लांट के खिलाफ कोई निर्देश पारित करने से इन्कार कर दिया और राज्य एवं केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब दाखिल करने को कहा। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा, हम राज्य और केंद्र सरकार का जवाब देखे बिना कोई आदेश नहीं देंगे। पीठ ने पर्यावरण कार्यकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख से कहा, राज्य में बिजली की कमी हो सकती है। हम इस तरह के आदेश पारित नहीं कर सकते। हमें पर्यावरण संबंधी चिंताओं और विकास के बीच संतुलन बनाना होगा।

पारिख ने पीठ से कहा, यह संयंत्र जंगलों से घिरा हुआ है और इससे भालू और अन्य वन्यजीवों को खतरा हो सकता है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित अधिकरण में याचिका लंबित होने के बावजूद अडानी समूह को पर्यावरण मंजूरी मिल गई। वकील ने दलील दी, वे वहां बहुत बड़ा विद्युत संयंत्र बना रहे हैं, और इससे पर्यावरण और वन्यजीव प्रभावित हो सकते हैं। सीजेआई ने कहा, समस्या यह है कि कभी विद्युत संयंत्रों को लेकर चिंता जताई जाती है, कभी जंगलों को लेकर, कभी नदियों को लेकर, लेकिन विकास परियोजनाओं को इस तरह रोका नहीं जा सकता।  पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार और अदाणी समूह को भी इस मामले में अपना जवाब दाखिल करने की अनुमति दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, दिव्यांगता पेंशन राज्य की कृपा पर निर्भर कोई अनुग्रह राशि नहीं 
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि दिव्यांगता पेंशन न तो कोई इनाम है और न ही राज्य की कृपा पर निर्भर कोई अनुग्रह राशि है। सरकार इस पर अपने दृष्टिकोण में चयनात्मक या असमान नहीं हो सकती।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए पूर्व सैनिकों को दिव्यांगता पेंशन के भुगतान संबंधी सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के आदेश को चुनौती देने वाली केंद्र सरकार की अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी लाभ को नीति के तहत मान्यता दी जाती है और न्यायिक निर्णय से इसकी पुष्टि की जाती है, तो उस पर अमल चयनात्मक या असमान नहीं हो सकता।

कोर्ट ने कहा कि पेंशन अतीत की सेवा के लिए मुआवजे का एक विलंबित हिस्सा है और निर्धारित शर्तों की पूर्ति होने पर एक निहित और लागू करने योग्य अधिकार में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए पेंशन संबंधी अधिकार संपत्ति के समान हैं और इन्हें कानून के अधिकार के अलावा रोका, कम या समाप्त नहीं किया जा सकता। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि आदर्श नियोक्ता के रूप में भारत सरकार से राष्ट्र की सेवा करने वालों को दिए जाने वाले लाभों में निष्पक्षता, निरंतरता और समान व्यवहार करने की अपेक्षा रखी जाती है।

सुप्रीम कोर्ट- गलती की संभावना को कम से कम करने की कोशिश होनी चाहिए 
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत होने के नाते, यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाना चाहिए कि ऐसी कोई भी गलती न हो जिसका राष्ट्र के विकास और प्रगति पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने चेतावनी दी कि यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि न्यायिक प्रणाली में पूर्वानुमान का कोई तत्व नहीं है। पीठ ने ये टिप्पणियां परियोजनाओं को पूर्वव्यापी पर्यावरण मंजूरी देने के मुद्दे से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई करते हुए की।

सीजेआई ने कहा, हमें देश पर इसके समग्र प्रभावों और परिणामों पर भी विचार करना चाहिए। शीर्ष अदालत में, हमें ऐसी किसी भी गलती की संभावना को कम से कम करना चाहिए जिसका देश के विकास, प्रगति या पर्यावरण पर दूरगामी और विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। पिछले साल 18 नवंबर को, सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले को पलटते हुए, केंद्र और अन्य प्राधिकरणों की ओर से पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को भारी जुर्माने के भुगतान पर पूर्वव्यापी पर्यावरण मंजूरी देने का मार्ग प्रशस्त किया।

राजाजी नेशनल पार्क से गुजरने वाली सड़क परियोजना को सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के स्थगन आदेश में संशोधन करते हुए उत्तराखंड में 11.5 किलोमीटर लंबी लालढांग-चिल्लारखाल सड़क के निर्माण की अनुमति दे दी। इससे राज्य के 18 दूर दराज के गांवों के करीब 40,000 लोगों को लाभ होगा। हालांकि, शीर्ष अदालत ने व्यावसायिक वाहनों पर रोक को बरकरार रखा है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने इस सड़क पर व्यावसायिक वाहनों के चलने की अनुमति नहीं दी। सड़क का 4.5 किमी हिस्सा चमरिया बेंड से सिगड़ी सोट तक पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र में आता है। यह जिम कॉर्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व को जोड़ने वाला इकलौता वन्यजीव कॉरिडोर है। अदालत ने कहा कि भारी ट्रक और डंपर इस मार्ग से नहीं गुजरेंगे।

हिमाचल में निजी जमीन पर सूखे-गले खैर पेड़ों की कटाई न रोक नहीं, सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिमाचल प्रदेश में निजी भूमि पर सूखे, गिरे हुए, फफूंदग्रस्त और सड़े हुए खैर के पेड़ों की कटाई पर कोई प्रतिबंध नहीं है। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि वर्ष 1996 में राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई पर लगाया गया प्रतिबंध पहले ही 16 फरवरी 2018 और 10 मई 2023 के आदेशों के जरिए संशोधित किया जा चुका है, जिनमें खैर के पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई थी। 

मामले में नियुक्त न्याय मित्र के परमेश्वर ने बताया कि हाईकोर्ट ने यह कहते हुए हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया था कि मामला शीर्ष अदालत में लंबित है। याचिकाकर्ताओं ने पहले जिला वन अधिकारी से सूखे खैर पेड़ काटने की अनुमति मांगी थी, लेकिन अनुमति न मिलने पर हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। पीठ ने हिमाचल प्रदेश सरकार को 10 मई 2023 के आदेश का पालन करते हुए एक समिति गठित करने का निर्देश दिया, ताकि ऐसी कटाई की अनुमति संबंधी मामलों का निपटारा किया जा सके।
पेड़ों की कटाई का ठेका निजी एजेंसियों को न दिया जाए
 

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जमानत आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने बताया न्याय का उपहास
सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से आरोपी पति को जमानत दिए जाने के आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई है। शीर्ष अदालत ने इस आदेश को बेहद चौंकाने वाला और निराशाजनक बताते हुए कहा कि इससे न्याय की प्रक्रिया का उपहास हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 10 अक्तूबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए आरोपी पति देवराज वर्मा को तत्काल ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने मृतका के पिता चेतराम वर्मा की अपील को स्वीकार कर लिया। यह मामला श्रावस्ती जिले का है। एक युवती की शादी के कुछ ही महीनों के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। प्राथमिकी में पति पर दहेज की मांग और लगातार मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पीठ ने हाईकोर्ट के जमानत आदेश पर सवाल उठाते हुए कहा कि आदेश को पढ़ने से यह स्पष्ट नहीं होता कि हाईकोर्ट ने जमानत देने का विवेक किस आधार पर इस्तेमाल किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने केवल बचाव पक्ष की दलीलों को दर्ज किया और यह कहकर जमानत दे दी कि आरोपी 27 जुलाई 2025 से जेल में है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।

कहा- अपराध की प्रकृति, निर्धारित सजा जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को ध्यान में रखना आवश्यक
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध में जमानत पर विचार करते समय अपराध की प्रकृति, निर्धारित सजा, आरोपी और मृतका के बीच पति-पत्नी का संबंध तथा घटनास्थल जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके अलावा पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण गला घोंटने से दम घुटना बताया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश की एक प्रति इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया है, जिससे कि इसे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जा सके।

तमिलनाडु सरकार डीजीपी की नियुक्ति के लिए सात दिन में पेश करे संशोधित प्रस्ताव
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति के लिए सात दिन के भीतर यूपीएससी को अपना संशोधित प्रस्ताव पेश करने का निर्देश दिया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि यूपीएससी इसके बाद दो सप्ताह के भीतर अपनी अंतिम सिफारिश देगा। सुप्रीम कोर्ट ने यूपीएससी को निर्देश दिया था कि यदि प्रस्ताव समय पर प्रस्तुत नहीं किया जाता है तो वह उसके समक्ष उचित आवेदन प्रस्तुत करे। सुनवाई के दौरान, पीठ ने कहा कि तमिलनाडु के लिए राज्य की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक मामूली बदलाव को छोड़कर 5 फरवरी को उसकी ओर से पारित निर्देशों का पालन सभी राज्यों और यूपीएससी को करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया कि तमिलनाडु के कार्यवाहक डीजीपी भी नियमित डीजीपी पद के लिए आकांक्षी हैं। इसलिए उन्हें डीजीपी की नियुक्ति के लिए गठित समिति में शामिल नहीं किया जा सकता है। पीठ ने कहा कि तमिलनाडु को चयन समिति में दो सदस्य रखने का अधिकार है। पीठ ने तमिलनाडु सरकार को चयन समिति में डीजीपी से उच्चतर या समकक्ष पद और प्रतिष्ठा वाले अधिकारी को मनोनीत करने की अनुमति दी है।

अदाणी के थर्मल प्लांट के बारे में केंद्र और यूपी सरकार का पक्ष सुने बिना आदेश नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में अदाणी समूह के प्रस्तावित थर्मल पावर प्लांट के खिलाफ कोई निर्देश पारित करने से इन्कार कर दिया और राज्य एवं केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब दाखिल करने को कहा। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा, हम राज्य और केंद्र सरकार का जवाब देखे बिना कोई आदेश नहीं देंगे। पीठ ने पर्यावरण कार्यकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख से कहा, राज्य में बिजली की कमी हो सकती है। हम इस तरह के आदेश पारित नहीं कर सकते। हमें पर्यावरण संबंधी चिंताओं और विकास के बीच संतुलन बनाना होगा। पारिख ने पीठ से कहा, यह संयंत्र जंगलों से घिरा हुआ है और इससे भालू और अन्य वन्यजीवों को खतरा हो सकता है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित अधिकरण में याचिका लंबित होने के बावजूद अडानी समूह को पर्यावरण मंजूरी मिल गई। वकील ने दलील दी, वे वहां बहुत बड़ा विद्युत संयंत्र बना रहे हैं, और इससे पर्यावरण और वन्यजीव प्रभावित हो सकते हैं।

स्थगन आदेश में किया संशोधन...राजाजी नेशनल पार्क से गुजरने वाली सड़क परियोजना को दी मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपने पूर्व के स्थगन आदेश में संशोधन करते हुए उत्तराखंड में 11.5 किलोमीटर लंबी लालढांग-चिल्लारखाल सड़क के निर्माण की अनुमति दे दी। इससे राज्य के 18 दूर दराज के गांवों के करीब 40,000 लोगों को लाभ होगा। हालांकि, शीर्ष अदालत ने व्यावसायिक वाहनों पर रोक को बरकरार रखा है।

दिव्यांगता पेंशन राज्य की कृपा पर निर्भर कोई अनुग्रह राशि नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिव्यांगता पेंशन न तो कोई इनाम है और न ही राज्य की कृपा पर निर्भर कोई अनुग्रह राशि है। सरकार इस पर अपने दृष्टिकोण में चयनात्मक या असमान नहीं हो सकती। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए पूर्व सैनिकों को दिव्यांगता पेंशन के भुगतान संबंधी सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के आदेश को चुनौती देने वाली केंद्र सरकार की अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी लाभ को नीति के तहत मान्यता दी जाती है और न्यायिक निर्णय से इसकी पुष्टि की जाती है, तो उस पर अमल चयनात्मक या असमान नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि पेंशन अतीत की सेवा के लिए मुआवजे का एक विलंबित हिस्सा है और निर्धारित शर्तों की पूर्ति होने पर एक निहित और लागू करने योग्य अधिकार में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए पेंशन संबंधी अधिकार संपत्ति के समान हैं और इन्हें कानून के अधिकार के अलावा रोका, कम या समाप्त नहीं किया जा सकता। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि आदर्श नियोक्ता के रूप में भारत सरकार से राष्ट्र की सेवा करने वालों को दिए जाने वाले लाभों में निष्पक्षता, निरंतरता और समान व्यवहार करने की अपेक्षा रखी जाती है। 
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कर्नाटक की दरगाह में महाशिवरात्रि पर होगी पूजा, रोक लगाने की मांग खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक स्थित आलंद लाडले माशाइक दरगाह के प्रबंधन की उस याचिका को सुनने से इन्कार कर दिया जिसमें दरगाह परिसर में महाशिवरात्रि पूजा और अन्य हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों पर रोक लगाने की मांग की गई थी। दरगाह प्रबंधन ने याचिका में आरोप लगाया था कि हर वर्ष कुछ हिंदू पक्ष रणनीतिक रूप से अदालतों से अंतरिम आदेश हासिल कर दरगाह के धार्मिक स्वरूप को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। याचिका में कहा गया था कि जो कार्य साक्ष्यों और अंतिम निर्णय के माध्यम से संभव नहीं हो पा रहे हैं, उन्हें अंतरिम आदेशों के जरिये पूरा करने की कोशिश की जा रही है। यह उपासना स्थल अधिनियम, 1991 के प्रावधानों के विपरीत है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि इस प्रकार का विवाद सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में लाया जाना उचित नहीं है। एक दिन पहले सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने भी टिप्पणी की थी कि पहले संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाना चाहिए। विवादित स्थल 14वीं शताब्दी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी उर्फ लाडले माशाइक और 15वीं शताब्दी के हिंदू संत राघव चैतन्य से जुड़ा बताया जाता है। परिसर में राघव चैतन्य शिवलिंग होने का भी दावा किया गया है। वर्ष 2022 में पूजा अधिकारों को लेकर दोनों समुदायों के बीच तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई थी। फरवरी 2025 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने 15 हिंदू श्रद्धालुओं को महाशिवरात्रि पर पूजा की अनुमति दी थी।
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