फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Supreme Court: 'सजा देते वक्त मामले से जुड़ी हर परिस्थिति पर किया जाना चाहिए विचार', सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

Tue, 05 Sep 2023 06:21 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

शीर्ष अदालत इलाहाबाद हाईकोर्ट के अप्रैल 2019 के फैसले को चुनौती देने वाले दोषी प्रमोद कुमार मिश्रा द्वारा दायर अपील पर विचार कर रही थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1984 के हत्या की कोशिश मामले में आरोपी को सुनाई गई पांच साल की सजा बरकरार रखा था। अब शीर्ष अदालत ने आरोपी की सजा को घटाकर तीन साल कर दिया है।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई सजा को कम कर दिया है। साथ ही यह भी कहा कि सजा देते वक्त उन परिस्थतियों को भी ध्यान में रखना चाहिए जिनकी वजह से मामला गंभीर हो गया हो या फिर हल्का या कम। न्यायमूर्ति ए एस ओका और न्यायमूर्ति संजय करोल की पीठ ने यह भी कहा कि भारत में कोई वैधानिक सजा नीति नहीं है। 

विज्ञापन


शीर्ष अदालत की पीठ इलाहाबाद हाईकोर्ट के अप्रैल 2019 के फैसले को चुनौती देने वाले दोषी प्रमोद कुमार मिश्रा द्वारा दायर अपील पर विचार कर रही थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1984 के हत्या की कोशिश मामले में आरोपी को सुनाई गई पांच साल की सजा बरकरार रखा था। अब शीर्ष अदालत ने आरोपी की सजा को घटाकर तीन साल कर दिया।

न्यायमूर्ति ए एस ओका और न्यायमूर्ति संजय करोल की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि याची प्रमोद कुमार मिश्रा का कोई आपराधिक इतिहास रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया है। साथ ही यह नहीं कहा जा सकता है कि उन्होंने पूर्व-निर्धारित तरीके से अपराध किया था। उन्होंने कहा कि भारत में आज तक वैधानिक सजा नीति नहीं है। हालांकि,अदालत ने सजा देने के पीछे के उद्देश्य और ऐसी सजा देते समय ध्यान में रखे जाने वाले कारकों की जांच की है। यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि सजा देते वक्त उन परिस्थतियों को भी ध्यान में रखना चाहिए जिनकी वजह से मामला गंभीर हो गया हो या फिर हल्का या कम।
विज्ञापन


पीठ ने मामले का जिक्र करते हुए कहा कि इस अपराध को अब 39 साल बीत चुके हैं। साथ ही मामले के दो सह-आरोपियों को निचली अदालत ने बरी कर दिया है। ऐसे में न्याय के हित में यह अदालत अपीलकर्ता और आरोपी को दी गई सजा को पांच साल के कठोर कारावास से घटाकर तीन साल के कठोर कारावास में बदल देती है। साथ ही अपीलकर्ता को छह सप्ताह के भीतर 50,000 रुपये का जुर्माना देना होगा। यह जुर्माना शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में दिया जाएगा। शीर्ष अदालत ने अपीलकर्ता को सजा की शेष अवधि भुगतने का निर्देश दिया।

बता दें कि अभियोजन पक्ष का कहना था कि अगस्त 1984 में मिश्रा सहित तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि तीनों ने एक व्यक्ति पर हमला किया था, जिसने उसकी फसल को नष्ट करने के उनके प्रयास का विरोध किया था। हालांकि मुकदमे के दौरान, याची मिश्रा ने अपराध करने से इनकार किया और दावा किया कि पुरानी दुश्मनी के कारण उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।
 
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने मार्च 1987 में याची मिश्रा को भारतीय दंड संहिता के तहत हत्या के प्रयास के अपराध के लिए दोषी ठहराया गया था और पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। जिसके खिलाफ उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था। जहां हाई कोर्ट ने ट्रॉयल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था।  

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें