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सुप्रीम कोर्ट ने चुना अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थता का रास्ता

Sat, 09 Mar 2019 04:52 AM IST
गौरव द्विवेदी राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थता का रास्ता चुना है। ऐसा नहीं है कि इस विवाद का हल निकालने के लिए पहली बार मध्यस्थता का प्रयास किया गया है। पहले भी अदालतों के स्तर पर सुलह समझौते कोशिशें हुई हैं लेकिन उनका नतीजा नहीं निकल सका।

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वर्ष 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले में मध्यस्थता के जरिये समाधान निकालने का प्रयास किया था। यह कोशिश तब हुई जब मामले में हाईकोर्ट में बहस पूरी हो चुकी थी। पीठ के सदस्य ने सभी पक्षकारों के वकीलों को अपने चैंबर में बुलाकर पूछा था कि क्या वे समझौता करने को तैयार हैं। तब हिंदू व मुस्लिम पक्षकारों को यह मंजूर नहीं था। सुप्रीम कोर्ट को भी बताया गया था कि हाईकोर्ट मामले में मध्यस्थता पर विचार कर रहा है और इसके लिए पक्षकारों को 23 सितंबर 2010 तक का वक्त दिया गया है।

इसी दौरान पूर्व नौकरशाह रमेश चंद्र त्रिपाठी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर करके मामले में मध्यस्थता की मांग की थी। यह याचिका बहुमत के आधार पर खारिज कर दी गई। यहां तक कि याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। फिर त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने 23 सितंबर, 2010 को हाईकोर्ट को फैसला देने पर रोक लगा दी थी। इसके ठीक अगले दिन संभवत: फैसला सुनाया जाना था। 
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इस वक्त केंद्र सरकार के ओर से पेश तत्कालीन अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि केंद्र सरकार समझौते का समर्थन करती है लेकिन वह अनिश्चितता नहीं चाहती है। वहीं याचिकाकर्ता त्रिपाठी की ओर से पेश वकील मुकुल रोहतगी ने कहा था कि यह विवाद भावनात्मक है, लिहाजा अदालत व सरकार को मध्यस्थता कराने की पहल करनी चाहिए। उस वक्त रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने फैसले में देरी की बात कहते हुए उक्त प्रयास का विरोध किया था। हालांकि, तब भी निर्मोही अखाड़ा मध्यस्थता के पक्ष में था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी जिसके अगले ही दिन हाईकोर्ट ने भी अपना फैसला दे दिया था।
 

सुप्रीम कोर्ट ने की थी मध्यस्थता कराने की कोशिश 

वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस जे. एस. खेहड की अध्यक्षता वाली पीठ ने विवाद को संवेदना और आस्था से जुड़ा मामला बताया था। चीफ जस्टिस खेहड ने पक्षकारों को आपसी रजामंदी से विवाद सुलझाने का सुझाव दिया गया था। चीफ जस्टिस खेहड ने यहां तक कहा था कि यदि पक्षकार चाहते हैं कि मध्यस्थता करने वालों के साथ मैं भी बैठूं तो इसके लिए भी मैं तैयार हूं। हालांकि यह कोशिश असफल हो गई थी।

इन कोशिशों का भी नहीं निकला कोई नतीजा

1986 : कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य ने इस विवाद को बातचीत से सुलझाने की कोशिश की। उनकी और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तत्कालीन चेयरमैन के बीच बातचीत हुई, लेकिन मामला हल नहीं हो पाया।

1990-91: प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार और राजस्थान के मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत की मध्यस्थता में बात कराई। हालांकि, सरकार जाते ही मामला लटक गया।

1991: पीवी नरसिंह राव की सरकार में विवाद को आपसी समझौते से हल करने की कोशिश हुई। सुबोधकांत सहाय की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई। तीन हल सुझाए गए, लेकिन बात नहीं बन पाई और ढांचा गिरा दिया गया।

2012 : बाबरी मस्जिद पक्ष के मुद्दई हाशिम अंसारी से बातचीत करके हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास ने भी मामले में समझौते की कोशिशें की। एक खाका भी तैयार किया, लेकिन यह भी परवान नहीं चढ़ सका।
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अटल सरकार में भी हुई कोशिशें

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में पीएमओ में अयोध्या प्रकोष्ठ बनाया गया था। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को तैनात करके कई बार सुलह का प्रयास किया गया, लेकिन हल नहीं निकला।

पहली कोशिश में श्री श्री रविशंकर हो चुके हैं असफल  

श्री श्री रविशंकर भी 2017 में मध्यस्थता के जरिये विवाद का हल निकालने की कोशिश की थी। श्री श्री और शिया वक्फ बोर्ड तत्कालीन चेयरमैन वसीम रिजवी मुस्लिम व हिंदू पक्षकारों से मिले और बातचीत की लेकिन कोई हल नहीं निकला। हालांकि, श्री श्री ने तब अयोध्या विवाद का समाधान निकालने का दावा किया था।  
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