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Bengal Election: 'बांचते चाईं बीजेपी ताई का दिया नारा', बंगाल में सुनील बंसल बने भाजपा के लिए साइलेंट गेमचेंजर

Tue, 05 May 2026 04:06 AM IST
अमन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

भाजपा के रणनीतिकार सुनील बंसल ने पर्दे के पीछे रहकर पश्चिम बंगाल में पार्टी की चुनावी रणनीति को नई धार दी। जमीनी संगठन, स्थानीय मुद्दों और सटीक सामाजिक समीकरणों के जरिए उन्होंने भाजपा के लिए सियासी समीकरण बदल दिए।
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सुनील बंसल - फोटो : ANI
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आठ साल तक संगठन मंत्री और चार साल से पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रहते किसी ने इन्हें टीवी डिबेट में नहीं देखा। करीब 12 साल के राजनीतिक सफर में समाचार पत्रों में उनके साक्षात्कार तो दूर बयान तक नहीं छपे। वह भी तब, जब उन्हें उत्तर प्रदेश में भाजपा की लोकसभा और विधानसभा के दो-दो चुनावों में जीत का शिल्पकार करार दिया गया। गृह मंत्री अमित शाह के बेहद करीबी उसी सुनील बंसल ने अपनी मौन रणनीति से पूरब में भाजपा के लिए अब तक अभेद्य किला रहे पश्चिम बंगाल को अपनी व्यूह रचना से भेद दिया। वह भी तब, जब करीब दो साल पहले उसी पश्चिम बंगाल में पार्टी को मिली करारी हार के बाद उनकी प्रतिभा और क्षमता पर सवाल उठाए जा रहे थे।
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लोकसभा चुनाव में मिली शिकस्त को बंसल ने चुनौती के रूप में स्वीकार किया। बंग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना को जमीनी स्तर पर मुद्दा बना कर तृणमूल के भोद्रोलोक और बंगाल अस्मिता से जुड़े वोट बैंक को तोड़ने के लिए बांचते चाईं-बीजेपी ताई (जीना है तो भाजपा जरूरी) का नारा गढ़ा जो देखते ही देखते पार्टी का प्रमुख नारा बन गया। जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करने के लिए बंसल ने कई प्रयोग किए। इसके लिए 1.65 लाख घर-घर बैठकें आयोजित करने के साथ ही हर विधानसभा में कमल मेलाओं का आयोजन और फुटबॉल मैच आयोजित कराए। इस दौरान हिंसा के कारण वोट देने से वंचित रहने वाले बूथों की पहचान की, जिससे हिंसामुक्त चुनाव में मदद मिली।

बंसल ने ऐसे वर्ग को चिन्हित किया जो बीते कई चुनाव से वोट नहीं डाल पा रहे थे। उनकी टीम का दावा है कि इस चुनाव में करीब 10% ऐसे मतदाताओं ने वोट डाले जो इससे पहले मतदान केंद्रों तक नहीं पहुंच पाते थे। तृणमूल के ताकतवर महिला वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए उन्होंने संदेशखाली व आरजीकर दुष्कर्म मामले को महिला स्वाभिमान और सम्मान से जोड़ने की सफल रणनीति बनाई। भाजपा नेताओं के मछली खाने जैसे दृश्य पार्टी को बंगाल अस्मिता से जोड़ने के लिए बंसल की ही बनाई रणनीति थी। इसके साथ ही उन्होंने तृणमूल की सिंडिकेट राजनीति पर भी जमीनी स्तर पर प्रहार की रणनीति तैयार की और सबसे अहम टिकट वितरण में स्थानीय लोगों को तरजीह दी। पश्चिम बंगाल में अब मिली सफलता ने सवालों को पीछे छोड़ दिया है और राष्ट्रीय राजनीति में बंसल के कद को और बड़ा कर दिया है।
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