सुकमा में नक्सलियों के थोड़े से अंतराल में दो हमलों ने छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक को हिलाकर रख दिया है। दोनों ही नक्सली हमलों ने केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और सुरक्षा बलों के लिए अपने पीछे कई सवाल छोड़े हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ कांफ्लिक्ट मैनेजमेंट के अजय साहनी का कहना है कि छह-सात साल के सफल आपरेशन के बाद जहां नक्सली सुस्त पड़ रहे थे, वहीं सरकार के कान में तेल डालकर सोने का नतीजा है यह हमला।
सीआरपीएफ के पूर्व डीजी के विजय कुमार के समय में नक्सलवाद के विरुद्ध ठोस आपरेशन चलाया गया। यह आपरेशन भविष्य को ध्यान में रखकर तैयार की रणनीति के आधार पर था। के विजय कुमार के समय में उनका दाहिना हाथ कहे जाने वाले आईपीएस अधिकारी का भी मानना है कि सुकमा नक्सली हमला भयानक चूक का नतीजा है। सूत्र का कहना है कि 2010 में दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे। तब तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने अपनी भूल सुधारते हुए इस पर विशेष ध्यान दिया था। के. विजय कुमार की देखरेख में आंध्र प्रदेश के नक्सलियों से लड़ने के मॉडल को अपनाया गया। अजय साहनी का भी कहना है कि इस मॉडल में नक्सल नेताओं(टॉप लीडरशिप) पर नकेल कसने की रणनीति बनी। डॉग स्क्वायड, महिला इंटेलीजेंस विंग, लोकल इंटेलीजेंस समेत कई पहलुओं पर काम हुए। मुख्यधारा में नक्सलियों के लौटने, उनके पुर्नवास आदि पर स्पष्ट दिशा तय की गई। उसी का नतीजा था कि नक्सल हिंसा लगभग काबू में आ गई थी, लेकिन नक्सलियों ने सुरक्षा बलों की चूक का फायदा उठा लिया।
एक तिहाई रह गई लीडरशिप
मौजूदा समय में नक्सलियों की टॉप लीडरशिप बहुत कमजोर हो चुकी है। उनका मध्य आर्डर भी बहुत क्षीण हो चुका है। केवल एक तिहाई लीडरशिप ही बची है। इसके बावजूद नक्सलियों ने घात लगाकर हमला कर दिया। रायपुर को तोंगपाल और सुकमा से जोडऩे वाली 70 किमी की सडक़ परियोजना को सुरक्षा दे रहे सीआरपीएफ कर्मियों पर हमला कर दिया। अजय साहनी का कहना है कि उन्हें इसमें कोई अचरज नहीं हुआ। क्योंकि नक्सली छापामार युद्धपद्धति अपनाते हैं। वह लंबे समय तक खामोश रहते हैं और जहां सुरक्षा बलों की कमजोरी पकड़ में आई घात लगाकर हमला कर देते हैं।