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रघुराम ही नहीं सुब्बाराव को भी चुकानी पड़ी थी सरकार से टकराने की कीमत

Fri, 15 Jul 2016 04:41 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन बेशक भाजपा नेताओं के निशाने पर रहकर दूसरे कार्यकाल से हाथ जोड़ चुके हों लेकिन यह दंश केवल उन्हें ही नहीं झेलना पड़ा है। उनके पूर्ववर्ती डी सुब्बाराव भी सरकार से टकराने का नुकसान झेल चुके हैं। 
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यूपीए कार्यकाल में पांच साल तक रिजर्व बैंक के गर्वनर रहे डी सुब्बाराव ने अपनी आने वाली किताब हू मूव्ड माई इंटरेस्ट रेट में इस बात का खुलासा किया है। खास बात ये है कि इसमें उन्होंने सरकार के दो वित्तमंत्रियों पी चिदंबरम और प्रणव मुखर्जी से अपने मतभेदों को लेकर भी खूब खुलकर लिखा है। सुब्बाराव की यह किताब अगले महीने बाजार में आएगी। 

उससे पहले ही इसके कुछ अंश मीडिया में आ गए हैं। जिसमें सुब्बाराव ने पूर्व वित्त मंत्रियों के साथ अपने संबंधों को लेकर खुलकर चर्चा की है। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे वित्तमंत्री पी चिदंबरम और प्रणव मुखर्जी ने निवेश बढ़ाने के लिए उन पर ब्याज दरें घटाने का दबाव बनाया था।
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किताब में सुब्बाराव लिखते हैं कि मुझसे कई बार यह सवाल पूछा गया कि क्या ब्याज दरें घटाने को लेकर उन पर सरकार का दबाव था, बिल्कुल था। वित्त मंत्रियों की ओर से इसके लिए अलग अलग तरीके से दबाव बनाया जाता था। 

ब्याज दरें घटाने के लिए दबाव बनाते थे चिदंबरम और प्रणब मुखर्जी

हालांकि इस बात को प्रणब मुखर्जी जिस तरीके से रखते थे उसे ही कहने का तरीका चिदंबरम का अलग होता था। वह अपनी दलीलें ज्यादा जोरदार तरीके से रखते थे। पी चिदंबरम चाहते थे कि वह ब्याज दरों को कम करने की घोषणा जल्द से जल्द कर दे, लेकिन बढ़ती महंगाई को देखते हुए ब्याज दरें बढ़ाना मजबूरी थी। 

सुब्बाराव ने बताया कि वित्तमंत्रियों से उनकी तनातनी का खामियाजा उनके जूनियरों यानि डिप्टी गर्वनरों को भी भुगतना पड़ा। जब चिदंबरम के दबाव में उषा थोराट और सुबीर गोकर्ण को उनकी सिफारिश के बाद भी दूसरा कार्यकाल नहीं दिया गया। 

हालांकि खुद सुब्बाराव इस मामले में खुशकिस्मत रहे जिन्हें 2008 से 2011 तक एक कार्यकाल पूरा करने के बाद 2011 में ही दोबारा गर्वनर बना दिया गया। इस पद पर वह 2013 तक रहे। 
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सुब्बाराव का दूसरा कार्यकाल नहीं चाहते थे चिदंबरम

वह बताते हैं कि 2011 में उनकी नियुक्ति से भी चिदंबरम चिढ़े हुए थे लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मर्जी के सामने उनकी एक नहीं चली। इसकी जानकारी भी उन्हें मीडिया के द्वारा मिली वित्त मंत्री या उनके अधिकारियों के द्वारा नहीं। मीडिया ने भी यह खबर प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट से उठाई थी।

किताब में वह पी लिखते हैं कि पी चिदंबरम उनसे इस कदर नाराज रहते थे कि एक बार उन्होंने सावर्जनिक तौर पर ही यह कह दिया था कि "अगर ग्रोथ की चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को अकेले ही चलना है तो हम चलेंगे।"

वह एक वाकये को याद करते हैं कि जब मौद्रिक नीति के मामले में उन्होंने सरकार की सलाह मानने से ही इंकार कर दिया था। इसके बाद चिदंबरम उनसे इस कदर नाराज हुए कि कुछ दिन बाद ही जी20 की बैठक में मैक्सिको में दोनों को एक दूसरे से आमना सामना हुआ। जिसमें चिदंबरम ने बाकी लोगों से दुआ सलाम किया लेकिन उन्हें लगातार नजरअंदाज करते रहे। सुब्बाराव लिखते हैं कि "इसका उन्हें बहुत बुरा लगा"।
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