शोधकर्ताओं ने वार्षिक बैठक में बताया कि यह अध्ययन प्राकृतिक और कृत्रिम दो तरह के प्रकाश पर किया गया। टाइप-2 मधुमेह पीड़ितों को दो अलग-अलग समूह में रखा गया, जिनमें से एक समूह को प्राकृतिक प्रकाश के संपर्क में लाया गया, जबकि दूसरे को कृत्रिम प्रकाश के संपर्क में रखा गया।
कृत्रिम उजाले की तुलना में प्राकृतिक प्रकाश के दौरान रक्त शर्करा का स्तर सामान्य होता है। अगर टाइप-2 मधुमेह रोगियों की दिनचर्या में प्राकृतिक प्रकाश के नियमित संपर्क में रहे तो उनके इलाज में काफी मदद मिल सकती है। यह खुलासा जर्मनी के शोधकर्ताओं ने एक चिकित्सकीय अध्ययन के बाद किया।
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शोधकर्ताओं ने यूरोपीय संघ (ईएएसडी) की वार्षिक बैठक में बताया कि यह अध्ययन प्राकृतिक और कृत्रिम दो तरह के प्रकाश पर किया गया। टाइप-2 मधुमेह पीड़ितों को दो अलग-अलग समूह में रखा गया, जिनमें से एक समूह को प्राकृतिक प्रकाश के संपर्क में लाया गया, जबकि दूसरे को कृत्रिम प्रकाश के संपर्क में रखा गया।
विश्लेषण में सामने आए ये तथ्य
इस दौरान दोनों ही समूह में आ रहे बदलावों पर विश्लेषण किया, जिसमें यह तथ्य सामने आया है कि प्राकृतिक प्रकाश रोगियों के उपचार में मददगार है। नीदरलैंड के मास्ट्रिच विश्वविद्यालय के प्रो. इवो हैबेट्स ने कहा, प्राकृतिक प्रकाश सर्कैडियन घड़ी का सबसे मजबूत पर्यावरणीय संकेत है, लेकिन अधिकांश लोग दिन के दौरान घर या ऑफिस में होते हैं और निरंतर कृत्रिम प्रकाश के संपर्क में रहते हैं।
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उन्होंने बताया कि सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक के बीच प्राकृतिक प्रकाश में रहने पर टाइप-2 मधुमेह मरीजों में काफी बेहतर परिणाम देखने को मिले हैं। खास बात यह है कि प्राकृतिक प्रकाश की तीव्रता आमतौर पर दोपहर 12:30 बजे सबसे अधिक पाई गई, जिसकी औसत रीडिंग 2453 लक्स जबकि कृत्रिम प्रकाश की औसत रीडिंग 300 लक्स थी।
दिनचर्या में बदलाव से उपचार होगा आसान
अध्ययन में पाया कि कृत्रिम उजाले की तुलना में प्राकृतिक प्रकाश के दौरान रक्त शर्करा का स्तर सामान्य सीमा के भीतर था और श्वसन विनिमय अनुपात कम था, जो दर्शाता है कि रोगियों के प्राकृतिक प्रकाश के संपर्क में आने पर ऊर्जा स्रोत के रूप में कार्बोहाइड्रेट के बजाय वसा का उपयोग करना आसान लगा। शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि उनका यह अध्ययन टाइप-2 मधुमेह रोगियों की दिनचर्या में बदलाव लाने से उनकी उपचार यात्रा को बेहद आसान बना सकता है।