करीब डेढ़ महीने के लंबे इंतज़ार के बाद इंजीनियर संतोष कुमार भारद्वाज नाइजीरियाई समुद्री लुटेरों के चंगुल से छूटकर अपने घर वाराणसी लौट आए हैं। संतोष सिंगापुर की शिपिंग कंपनी ट्रांसओसन प्राइवेट लिमिटेड में थर्ड इंजीनियर के पद पर काम करते थे। 26 मार्च को संतोष की पत्नी कंचना को पता चला कि उनके पति का अपहरण हो गया है। उसके बाद करीब 45 दिन तक उनकी रिहाई की कोशिशें चलती रहीं। अपहरण के समय के अनुभव बता रहे हैं संतोष। "घटना वाले दिन यानी 25 मार्च 2016 की रात हम नाइजीरिया के पोर्ट हारकोट से लागोस अपने शिप से जा रहे थे। तभी एके47 से लैस समुद्री लुटेरों ने शिप पर धावा बोल दिया।
समुद्री लुटेरों ने पूरे जहाज पर कब्ज़ा कर लिया। उन्होंने कैप्टन को बंधक बनाकर सभी को बाहर आने को कहा। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसा नहीं करने पर वे कैप्टन की हत्या कर देंगे। इसके बाद जहाज में छिपे हुए सभी कर्मचारियों को बाहर आना पड़ा। इसके बाद समुद्री लुटेरों ने सभी का पैसा लूट लिया। इसके बाद वो मुझे और मेरे चार अन्य साथियों को अपने साथ घने जंगल में ले गए और कंपनी से संपर्क कर पैसों की मांग करने लगे। मेरे साथ जिन लोगों को अगवा किया गया था, उनमें दो यूक्रेन, एक बांग्लादेश और एक पाकिस्तान का नागरिक था। 45 दिनों तक विपरीत परिस्थिति में एक साथ रहने की वजह से हम सभी एक परिवार की तरह हो गए थे। ज़्यादातर समय हम देश-दुनिया, घर-परिवार, राजनीति और अपने किस्से-कहानियां एक-दूसरे को सुनाया करते थे। पाकिस्तानी साथी से राजनीति पर ज़्यादा चर्चा हुआ करती थी, लेकिन ज़्यादातर पॉज़िटिव बातें ही होती थीं। बांग्लादेशी और पाकिस्तानी साथी हिंदी जानते थे, इसलिए मैं उनसे हिंदी में ही बात करता था।
लड़ाई-झगड़े की बातें इसलिए भी नहीं हुआ करती थीं क्योंकि फिर समय काटना मुश्किल हो जाता। अजीब बात ये थी कि 45 दिन के साथ के बाद एक-दूसरे से दूर जाने पर परिवार से बिछड़ने जैसा एहसास हो रहा था। एक-दूसरे के साथ संपर्क बना रहे इसलिए सभी ने एक दूसरे का ई-मेल और फोन नंबर भी शेयर किया। मेरा सबसे अधिक लगाव बांग्लादेश के साथी सेकंड इंजीनियर आमिन तालूकदार से था। मैं और आमिन एक ही बिस्तर पर सोते थे। इसलिए मेरा ज्यादातर समय आमिन के साथ बीतता था।
अपरहणकर्ता हमें खाने में नूडल्स और बीन्स उबालकर देते थे और सुबह नाश्ते में बिस्किट-ब्रेड मिलता था। अपरहणकर्ताओं ने हमें कभी छुआ तक नहीं। उनकी मंशा हमें शारीरिक नुक़सान पहुंचाने की थी ही नहीं। लेकिन डर तो लगता ही था कि पैसे नहीं मिले तो ये हमारे साथ क्या करेंगे? समुद्री लुटेरों के निशाने पर एशियाई लोग नहीं होते हैं। उनका मुख्य निशाना होते हैं यूरोपीय देशों के लोग, क्योंकि वहां से उन्हें तुरंत पैसा मिल जाता है। इन समुद्री लुटेरों पर किसी का ज़ोर नहीं चलता। उनके पास हथियार बहुत हैं। उनको अपनी ज़िंदगी या मौत की परवाह नहीं होती। अपरहणकर्ताओं ने मुझे बताया था अपरहण करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा चारा नहीं है। उन्होंने बताया था कि उनकी सरकार के पास तेल तो बहुत है, लेकिन लोगों के पास खाना नहीं है।
इसलिए वो भूखे मर रहे हैं। इसलिए मुझे लगता है कि ये सब कुछ ग़रीबी की वजह से हो रहा है। वहां की सरकार ध्यान दे और विकास हो तो इस पर अंकुश लग जाएगा। अपनी आजादी का श्रेय मैं कंपनी, परिवार, भारत सरकार, पीएमओ, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और मीडिया को देता हूँ। इस मामले को निपटाने के लिए मेरी कंपनी ने बड़े एक्सपर्ट को हायर किया था, तब जाकर हमारी रिहाई संभव हो पाई।"