30 साल के खेत मजदूर रामभाऊ महादेव घोड़के एक मकान के सामने खड़े हैं, जिसके दोनों दरवाजों पर बड़े ताले लटके हैं। मकान और तालों पर सरसरी नज़र डालकर जब वे लौट रहे थे, तभी हमसे उनका सामना हुआ।
"क्या यह मकान आपका है?" इस पर वे इनकार करते हुए कहते हैं, "जी नहीं, मेरे बड़े भाई का है। वो बाहर गए हैं।" आगे और पूछने पर कहते हैं, "वो अब गाँव शायद कभी नहीं लौटेंगे। अब तो मैं भी जाने की सोच रहा हूँ।"
मराठवाड़ा के लातूर को सरकार पानी की ट्रेन भेज रही है फिर भी यहां के गांव भिसे वाघोली के किसान घर छोड़कर क्यों जा रहे हैं? रामभाऊ के बड़े भाई सुभाष आखिरी बार दो महीने पहले पुणे से आए थे, अपनी पत्नी और बच्चों को पुणे ले जाने। मां चन्द्रभागा गांव में रह गईं, जिन्हें अपने बेटे और पोतों की याद आती है। कहती हैं, "6 माह पहले ऐन दीवाली के समय वह गया। फिर मार्च में आया और सबको साथ ले गया। हम यहीं रह गए। रामभाऊ भी गांव में नहीं रहना चाहते। वह पुणे जाना चाहते हैं। रामभाऊ का गणित साफ है। मनरेगा के काम कम हैं और कुछ ही दिन मिलते हैं। इनसे मिलते हैं 180 रुपये रोज, जिससे खर्च पूरा नहीं होता। शहर में प्रतिदिन इससे ज़्यादा मिलते हैं।
"भाई को वहां मालवाडी में सिक्योरिटी गार्ड- वॉचमैन की नौकरी मिल गई है। उनको 4-5 हज़ार रुपए मिल जाते हैं। यहां तो उनको काम भी नहीं मिलता था। अभी 2-3 दिन में हम भी जाने वाले हैं। यह सच है कि अब यहां पानी की किल्लत नहीं रही। टैंकर भी आते हैं, लेकिन समस्या काम न मिलने की है। मैं भी बीवी-बच्चों को लेकर निकलूंगा। माँ को भी साथ ले जाऊंगा।"
उम्रदराज़ मां को क्या पुश्तैनी गांव छोड़ने का दुख नहीं? रामभाऊ की मां कहती हैं, ''काम नहीं तो क्या करें, क्या खाएं। इसलिए जाना पड़ेगा।"
केवल रामभाऊ ही नहीं, इस गांव का हर शख्स मानो यहां से भाग जाना चाहता है। चार साल से लगातार पड़ रहे सूखे ने खेती उजाड़ दी। पानी नहीं तो किसी और की खेती में मजदूरी से भी गए। महीनेभर के लिए कोई और रोजगार भी नहीं, तो परिवार का खर्च कैसे चलेगा? गांव के कई परिवारों के मर्द रोज़गार की तलाश में पहले ही औरंगाबाद, पुणे या मुंबई निकल गए ताकि वहां काम जमाकर अपने पत्नी-बच्चों को भी साथ ले जाएं।