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बसें मुंबई और पुणे किसे ले जा रही हैं?

Mon, 30 May 2016 07:06 PM IST
संजय तिवारी / बीबीसी संवाददाता, महाराष्ट्र
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- फोटो : bbc
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30 साल के खेत मजदूर रामभाऊ महादेव घोड़के एक मकान के सामने खड़े हैं, जिसके दोनों दरवाजों पर बड़े ताले लटके हैं। मकान और तालों पर सरसरी नज़र डालकर जब वे लौट रहे थे, तभी हमसे उनका सामना हुआ।
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"क्या यह मकान आपका है?" इस पर वे इनकार करते हुए कहते हैं, "जी नहीं, मेरे बड़े भाई का है। वो बाहर गए हैं।" आगे और पूछने पर कहते हैं, "वो अब गाँव शायद कभी नहीं लौटेंगे। अब तो मैं भी जाने की सोच रहा हूँ।"

मराठवाड़ा के लातूर को सरकार पानी की ट्रेन भेज रही है फिर भी यहां के गांव भिसे वाघोली के किसान घर छोड़कर क्यों जा रहे हैं? रामभाऊ के बड़े भाई सुभाष आखिरी बार दो महीने पहले पुणे से आए थे, अपनी पत्नी और बच्चों को पुणे ले जाने। मां चन्द्रभागा गांव में रह गईं, जिन्हें अपने बेटे और पोतों की याद आती है। कहती हैं, "6 माह पहले ऐन दीवाली के समय वह गया। फिर मार्च में आया और सबको साथ ले गया। हम यहीं रह गए। रामभाऊ भी गांव में नहीं रहना चाहते। वह पुणे जाना चाहते हैं। रामभाऊ का गणित साफ है। मनरेगा के काम कम हैं और कुछ ही दिन मिलते हैं। इनसे मिलते हैं 180 रुपये रोज, जिससे खर्च पूरा नहीं होता। शहर में प्रतिदिन इससे ज़्यादा मिलते हैं।
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  "भाई को वहां मालवाडी में सिक्योरिटी गार्ड- वॉचमैन की नौकरी मिल गई है। उनको 4-5 हज़ार रुपए मिल जाते हैं। यहां तो उनको काम भी नहीं मिलता था। अभी 2-3 दिन में हम भी जाने वाले हैं। यह सच है कि अब यहां पानी की किल्लत नहीं रही। टैंकर भी आते हैं, लेकिन समस्या काम न मिलने की है। मैं भी बीवी-बच्चों को लेकर निकलूंगा। माँ को भी साथ ले जाऊंगा।"
उम्रदराज़ मां को क्या पुश्तैनी गांव छोड़ने का दुख नहीं? रामभाऊ की मां कहती हैं, ''काम नहीं तो क्या करें, क्या खाएं। इसलिए जाना पड़ेगा।"

केवल रामभाऊ ही नहीं, इस गांव का हर शख्स मानो यहां से भाग जाना चाहता है। चार साल से लगातार पड़ रहे सूखे ने खेती उजाड़ दी। पानी नहीं तो किसी और की खेती में मजदूरी से भी गए। महीनेभर के लिए कोई और रोजगार भी नहीं, तो परिवार का खर्च कैसे चलेगा? गांव के कई परिवारों के मर्द रोज़गार की तलाश में पहले ही औरंगाबाद, पुणे या मुंबई निकल गए ताकि वहां काम जमाकर अपने पत्नी-बच्चों को भी साथ ले जाएं।

सरकारी सहायता के बाद भी लातूर में हालात जस के तस

- फोटो : bbc
मंगल सुरेश आदमने के पति सुरेश और देवर संजय चार हफ्ते पहले मुंबई गए थे। मंगल उनके आने के इंतजार में हैं अपने छह साल के बच्चे प्रवीण और आठ साल के अरविंद के साथ। मंगल की देवरानी सोनाबाई संजय आदमने, उनकी डेढ़ साल की बच्ची ज्ञानेश्वरी और 66 साल की सास साकरु बाई वामन आदमने भी हैं। मंगल का विश्वास अटल है, "सूखा पड़ा है काम नहीं, क्या करने का, बैठ के क्या खाएंगे? इसलिए वो मुंबई चले गए। अब हम भी जल्दी जाने वाले हैं।"

हम बलिराम के एक कच्चे मकान पर पहुँचे। बलिराम मोहन मांडले को यहां रोज की रोटी कमाना भारी पड़ता था। अब उन्हें मुंबई में एक मसाला कंपनी में काम मिल गया है। पड़ोसी बताते हैं कि वह चार महीने पहले अपनी पत्नी, दो बेटियों और बेटे को लेकर निकल गए थे। बलिराम का घर ऐसे ही पड़ा है, कोई देखने वाला नहीं। रामभाऊ का परिवार गया तो उनके घरों को भी देखने वाला कोई न होगा।
रेल से पानी पहुँचने की वजह से लातूर शहर में तो पानी की किल्लत उतनी नहीं दिखती, पर गांवों में बहुत कुछ नहीं बदला है।

बस्ती के ठीक सामने एक कतार में लोगों के बर्तन रखे हैं- स्टील, प्लास्टिक, टिन और मिट्टी के। इनमें रामभाऊ के परिवार के बर्तन भी हैं। इन लोगों को इंतज़ार है टैंकर का जो हर दो-चार दिन बाद आता है।   कुछ किलोमीटर दूर चिंचोली गाँव में भी सड़क के दोनों किनारे बड़े ड्रम, पीपे और सिंथेटिक टैंक भी रखे मिलेंगे। यहां टैंकर सात दिन बाद आता है। सड़क के दोनों ओर भीड़ है, जिनमें पुरुष ज़्यादा हैं और सुबह सात बजे से खड़े हैं। हम साढ़े 10 बजे वहां पहुँचे थे। एक बुज़ुर्ग बताते हैं कि टैंकर को कल आना था, पर नहीं आया। नौजवान अशोक जोगदंड की शिकायत है कि सबको बराबर पानी नहीं मिलता। किसी को कम तो किसी को ज़्यादा मिलता है और जितना मिला उसमें पूरा हफ्ता गुजारना पड़ता है।'

सरकारी आंकड़े कहते हैं कि महाराष्ट्र के 14708 गांवों में सूखा घोषित हुआ है, जिनमें 8522 सिर्फ़ मराठवाड़ा से हैं। इस साल फ़रवरी से मई के बीच हजारों परिवारों ने मराठवाड़ा छोड़कर महानगरों का रुख किया है। लातूर तुअर दाल और सोयाबीन तेल का इलाका है। यहां के दाल कारोबारी नितिन कलंत्री के मुताबिक सूखे के चलते कम पैदावार हुई है। उधर कंस्ट्रक्शन पर पाबंदी है तो मजदूर छोड़कर बाहर जा रहे हैं।
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स्वराज अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव ने क्या कहा इस मुद्दे पर

- फोटो : bbc
मराठवाड़ा में 'जल-हल' पदयात्रा पर निकले स्वराज अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव पूछते हैं, "बसें मुंबई और पुणे किसे ले जा रही हैं? सैलानियों को या छोटे किसानों को? जब लोगों के पास कोई रास्ता नहीं बचता, तो वह चल देते हैं। साफ है कि सब कुछ ठीक नहीं, जैसा दावा हो रहा है। यह भी एक तरह की हिजरत है। ये लोग एक त्रासदी से दूसरी त्रासदी की ओर जा रहे हैं। इससे उन्हें बचाना होगा।"

लोग कह रहे हैं कि अगर बारिश ने इस बार भी धोखा दिया तो जो रह गए हैं, उन्हें हर हाल में इलाक़ा छोड़ना होगा क्योंकि यहां कुछ नहीं बचेगा। सरकारी अधिकारी लोगों के पलायन की ख़बरों से न इनकार करते हैं, न इसे कुबूल करते करते हैं। मगर आंखों देखा सच तो यही है।    
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