दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में बेहतर ढंग से चुनाव करवाने के लिए निर्वाचन आयोग की तारीफ की जाती है। मगर अभी भी आयोग को कई ताकत और सुधारों की दरकार हैं। अब तक देश में चुनाव सुधार सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही संभव हो पाए हैं। चुनाव विशेषज्ञ मानते हैं कि देश के चुनावी सिस्टम को चलाने वाली सरकारें और राजनीतिक दलों में इच्छाशक्ति की कमी है। वे चुनाव सुधार नहीं चाहते। चुनाव आयोग ने सरकार को सुधारों की लंबी सूची भेजी है।
राजनीति से अपराधीकरण पर रोक, राजनीतिक पार्टियों के खातों की ऑडिटिंग, चुनाव में काले धन की जांच, पेड न्यूज और सरकार प्रायोजित विज्ञापनों को चुनावी अपराध मानना और उम्मीदवारों द्वारा फर्जी हलफनामा देने को अपराध की श्रेणी में रखना जैसे तमाम चुनाव सुधार अधूरे पड़े हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी का कहना है कि अगर इन चुनौतियों को नजरअंदाज किया गया तो देश की चुनाव प्रणाली पर लोगों का विश्वास कम हो जाएगा। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मेजर अनिल वर्मा कहते हैं कि चुनाव आयोग के पास राजनीतिक दलों को मान्यता देने का अधिकार है मगर उसे उसकी मान्यता रद्द करने का अधिकार नहीं। चाहे वे कोई भी गैरकानूनी काम करें। इस स्थिति में चुनाव आयोग लाचार नजर आता है।
हफलनामे के तहत उम्मीदवारों की संपत्ति, योग्यता, देनदारियां और आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी देने का कदम सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही लागू हो पाया। साथ ही किसी भी अपराध के लिए दोषी विधायक और सांसद को दो साल की सजा और तुरंत अयोग्य करार दिए जाने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी जुलाई, 2013 में आया।