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Bar Council: 'स्टेट बार काउंसिल व बीसीआई नामांकन के लिए वैकल्पिक शुल्क नहीं ले सकते', सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

Sat, 09 Aug 2025 12:49 PM IST
कुमार विवेक न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Bar Council: राज्यों के बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया वकील के रूप में नामांकन लेने वाले विधि स्नातकों से वैधानिक शुल्क के अलावा कोई अन्य "वैकल्पिक" शुल्क नहीं वसूल सकते। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया है। न्यायालय ने कर्नाटक राज्य बार काउंसिल से ऐसी कोई भी राशि वसूलना बंद करने को कहा है। आइए इस बारे में विस्तार से जानें।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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राज्यों के बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया वकील के रूप में नामांकन लेने वाले विधि स्नातकों से वैधानिक शुल्क के अलावा कोई अन्य "वैकल्पिक" शुल्क नहीं वसूल सकते। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया है। न्यायालय ने कर्नाटक राज्य बार काउंसिल से ऐसी कोई भी राशि वसूलना बंद करने को कहा है। 

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न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने केएलजेए किरण बाबू की ओर से दायर अवमानना याचिका पर यह निर्देश पारित किया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्य बार काउंसिलों, विशेषकर कर्नाटक राज्य बार काउंसिल की ओर से विधि स्नातकों के नामांकन से अत्यधिक शुल्क नहीं लेने के संबंध में पिछले वर्ष जुलाई में इस न्यायालय की ओर से जारी निर्देशों का अक्षरशः पालन नहीं किया जा रहा है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अपने हलफनामे में कहा कि सभी राज्य बार काउंसिल न्यायालय के निर्देशों का पालन कर रही हैं और कर्नाटक राज्य बार काउंसिल की ओर से पहचान पत्र, प्रमाण पत्र, कल्याण निधि और प्रशिक्षण आदि के लिए ली जाने वाली 6,800 रुपये की फीस और वैधानिक शुल्क के अतिरिक्त 25,000 रुपये लिया जाना वैकल्पिक हैं, अनिवार्य नहीं।
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पीठ ने 4 अगस्त को पारित अपने आदेश में कहा, "हम यह स्पष्ट करते हैं कि वैकल्पिक जैसा कुछ नहीं है। कोई भी राज्य बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया वैकल्पिक रूप से किसी भी राशि की फीस नहीं वसूलेगी। उन्हें मुख्य फैसले में इस अदालत की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार ही फीस वसूलनी होगी।"

इसमें आगे कहा गया कि यदि कर्नाटक राज्य बार काउंसिल वैकल्पिक रूप से कोई राशि वसूल रही है, हालांकि यह अनिवार्य नहीं है, तो इसे रोका जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि शीर्ष अदालत के जुलाई 2024 के फैसले के अनुसरण में, एक वैधानिक निकाय होने के नाते, काउंसिल ने 6 अगस्त को सभी राज्य बार काउंसिलों को पत्र लिखा है और उन्हें इस अदालत की आरे से पारित फैसले के आलोक में उम्मीदवारों के नामांकन के साथ सख्ती से आगे बढ़ने का निर्देश दिया है।

बीसीआई ने कहा, "पत्र जारी होने के बाद, बीसीआई का दृढ़ विश्वास है कि सभी राज्य बार काउंसिल इस मामले में इस न्यायालय द्वारा पारित निर्णय का पालन कर रहे हैं।" बीसीआई ने विभिन्न राज्यों के विभिन्न बार निकायों द्वारा ली जाने वाली फीस का विस्तृत चार्ट भी दिया।

पिछले साल 30 जुलाई को शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि राज्य बार काउंसिल विधि स्नातकों को वकील के रूप में नामांकित करने के लिए अत्यधिक शुल्क नहीं ले सकते, क्योंकि यह हाशिए पर पड़े और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के खिलाफ प्रणालीगत भेदभाव को बढ़ावा देता है, साथ ही कानूनी पेशे में उनकी भागीदारी को कमजोर करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कुछ राज्य बार काउंसिलों (एसबीसी) द्वारा 15,000 रुपये से लेकर 40,000 रुपये तक की अत्यधिक फीस वसूलना "मौलिक समानता के सिद्धांत के विपरीत" है। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि एसबीसी और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) संसद द्वारा निर्धारित राजकोषीय नीति में "परिवर्तन या संशोधन" नहीं कर सकते।

इसने कहा था कि बार निकाय अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत शक्तियों के प्रतिनिधि हैं और एसबीसी और बीसीआई सामान्य और एससी-एसटी श्रेणियों के कानून स्नातकों के नामांकन के लिए क्रमशः 750 रुपये और 125 रुपये से अधिक शुल्क नहीं ले सकते हैं।

शीर्ष अदालत ने कहा था कि एसबीसी द्वारा नामांकन के समय कानूनी शर्त से अधिक शुल्क और प्रभार वसूलने का निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19(1)(जी) (पेशा अपनाने का अधिकार) का उल्लंघन है। अदालत ने साफ किया था कि उसके निर्णय का 'भविष्य में प्रभाव' होगा और एसबीसी को अब तक एकत्रित अतिरिक्त नामांकन शुल्क वापस करने की आवश्यकता नहीं है।

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