पिछले दिनों लखनऊ में हुई मुठभेड़ पर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश पुलिस के अलग-अलग दावे हैं। मध्य प्रदेश पुलिस का कहना है कि मुठभेड़ में मारे गए इंटरनेट और मोबाइल पर सैफ़ुल्ला की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी। मध्य प्रदेश पुलिस का कहना है कि सैफ़ुल्ला तथाकथित इस्लामिक स्टेट (आईएस) के भारत के मॉड्यूल का सदस्य था।
वहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस कहती है कि अभी तक ऐसे पुख़्ता सबूत नहीं मिले हैं जिससे कहा जा सके कि सैफ़ुल्ला आईएस का सदस्य था। हालांकि अभी जांच एजेंसियां आईएस से सैफ़ुल्ला के संबंधों की जांच कर रही हैं, एक बात तो साफ़ है कि जिनकी गतिविधियां संदिग्ध होती हैं उनके द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे इंटरनेट और मोबाइल पर जांच एजेंसियों की नजर रहती है।
यह भी कहा जाता है कि इंटरनेट और मोबाइल का इस्तेमाल करने वाला हर शख्स निगरानी में है। तो आखिर किस तरह होती है 'इंटरनेट स्नूपिंग' या इंटरनेट पर निगरानी? इंटरनेट हो या मोबाइल। यहां निगरानी से कोई नहीं बच सकता। यह भी कहा जाता है कि अमेरिका मोबाइल और इंटरनेट की हर गतिविधियों पर 24 घंटे नजर रखे हुए हैं।
विश्व के बदले हुए परिदृश्य में अब सुरक्षा एजेंसियां भी इंटरनेट और मोबाइल की जमकर 'मॉनिटरिंग' कर रहीं हैं। सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि इसी 'मॉनिटरिंग' की वजह से विश्व भर में सक्रिय आतंकवादी संगठनों पर अंकुश रखने में काफी हद तक कामयाबी भी मिल रही है। 'साइबर सिक्योरिटी' के विशेषज्ञ प्रसांतो राय कहते हैं कि इंटरनेट पर इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों के जरिए पता लगाया जा सकता है कि कौन क्या कर रहा है और कब।
इंटरनेट पर फिल्टर
सांकेतिक चित्र
- फोटो : bbc
क्या है पैटर्न
वो कहते हैं, "यह एक 'पैटर्न' या सिलसिला है। बात करने या शब्दों के इस्तेमाल का सिलसिला जिसे 'की-वर्ड्स' भी कहा जाता है। इससे अपने आप पता चल जाता है कि हो क्या रहा है। यह सिर्फ लिखे शब्द ही नहीं बल्कि आवाज पर भी लागू है। यहीं से पता चलता है और 'मॉनिटरिंग' शुरू हो जाती है।" मगर प्रसांतो का कहना है कि जिन ग्रुपों में एन्क्रिप्टेड चैट होती है उनको भेदना अब भी काफी मुश्किल है।
हलाकि, वो कहते हैं कि अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने 'एन्क्रिप्टेड डेटा' को भेदने में काफी हद तक क़ामयाबी हासिल कर ली है। साइबर सिक्योरिटी के एक और एक्सपर्ट और इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के रक्षित टंडन कहते हैं कि यह सबकुछ तकनीक करती है।
इंटरनेट पर फिल्टर
इंटरनेट पर ऐसे फ़िल्टर लगे हुए हैं जो अपने आप चीजों का पता लगाकर अलर्ट जारी करते हैं। टंडन कहते हैं, "अगर इंटरनेट पर किसी ने बम बनाने के तरीक़े को सर्च किया तो उतनी ख़ास बात नहीं है क्योंकि उत्सुकता वश कोई भी देख सकता है। मगर कोई अगर बार-बार उसे देखता है तो फिर वो अलर्ट अपने आप आ जाता है। यह निगरानी कोई इंसान नहीं बल्कि 'फ़िल्टर' के इंजन करते हैं।"
सामाजिक संगठनों को इंटरनेट पर सरकारी तांक-झांक पर आपत्ति रही है और वो इसके ख़िलाफ़ आवाज़ भी उठाते रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता मनीषा सेठी कहती हैं कि कई मामलों में देखा गया है कि जिनको चरमपंथी संगठन के सदस्य होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया वो अदालत से बरी भी हुए। उन्हें मीडिया के रोल पर भी आपत्ति है।
मनीषा कहती हैं कि मुठभेड़ के वक़्त ही नतीजे पर पहुँच जाना कि वो 'आईएस' का सदस्य था, जल्दबाज़ी है। उनका कहना है कि पिछले कई ऐसे मामले सामने हैं जब पुलिस ने इसी तरह किसी को किसी चरमपंथी संगठन का होने का आरोप लगाया वो अदालत से बरी कर दिया गया।