भारत के 77% गांव ओडीएफ प्लस मॉडल के तहत खुले में शौच मुक्त होने के साथ ही ठोस और तरल कचरा प्रबंधन करते हैं। स्थानीय नवाचारों से ये बदलाव संभव हुए हैं, जैसे उंचाडीह गांव में प्लास्टिक के बदले सैनिटरी पैड देना और उत्तराखंड के सिरासु गांव में पर्यटन से सफाई का खर्च निकालना।
भारत के 77 फीसदी गांवों को ओडीएफ प्लस मॉडल बन चुके हैं यानी ये गांव न केवल खुले में शौच से मुक्त हैं, बल्कि ठोस और तरल कचरे का प्रबंधन करते हैं। सफाई बनाए रखते हैं और जागरूकता फैलाते हैं। यह बदलाव स्थानीय प्रयोगों से संभव हो पाया है। अब 5.10 लाख से अधिक गांवों में ठोस कचरा निपटाने की व्यवस्था है।
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5.26 लाख से ज्यादा गांव तरल कचरे का निपटारा करते हैं। 1,200 से अधिक गांव बायोगैस प्लांट पंजीकृत हैं और 6.38 लाख से अधिक गांवों में कचरा इकट्ठा करने के लिए वाहन लगे हैं। भले ही सरकार ने 1,825 से अधिक ग्रामीण प्लास्टिक कचरा इकाइयां स्थापित की हैं, लेकिन आंकड़ों से परे ये असली बदलाव स्थानीय नवाचारों का नतीजा है। भुसली, उंचाडीह, घोरावल, सिरासु और घोकितो जैसे गांव दिखा रहे हैं कि स्थानीय और समुदाय-आधारित समाधान कैसे सफाई की तस्वीर बदल रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार,अगली चुनौती इन पहलों को लंबे वक्त तक टिकाऊ और आर्थिक रूप से सक्षम बनाए रखना होगी।
दो किलो प्लास्टिक के बदले सैनिटरी पैड
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के उंचाडीह गांव में भी इसी तरह की सामाजिक पहल मेरा प्लास्टिक, मेरी जिम्मेदारी अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत महिलाएं 2 किलोग्राम प्लास्टिक लाकर एक पैकेट सैनिटरी पैड पाती हैं। गांव की प्रधान अर्चना त्रिपाठी की इस पहल को स्वास्थ्यकर्मियों और शिक्षकों का समर्थन भी मिला है,जो मासिक धर्म से जुड़ी झिझक तोड़ने और प्लास्टिक कचरा घटाने में मदद कर रहे हैं।
उत्तराखंड का सिरासु गांव पर्यटन से निकाल रहा सफाई का खर्च : पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में गंगा नदी के किनारे सिरासु गांव में राजस्व-समर्थित अपशिष्ट प्रबंधन मॉडल उभरा है। कभी बुनियादी स्वच्छता की कमी वाला यह गांव अब ओडीएफ प्लस मॉडल साइट है। इस गांव में पर्यटन के जरिये सफाई का खर्च निकाला जा रहा है। गांव 2018 से प्री-वेडिंग फोटोशूट के लिए 1,000 रुपये शुल्क लेता है और टेंट व लाइट्स किराये पर देता है। इससे अब तक गांव को 50 लाख रुपये की आमदनी हो चुकी है।