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स्पेशल रिपोर्ट: ऐसे बीमार अस्पतालों के भरोसे देश कैसे स्वस्थ होगा?

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- फोटो : amar ujala
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नाइट शिफ्ट के बाद ऑफिस से निकला तो सीधा अस्पताल पहुंचा। गाजियाबाद के संजयनगर अस्पताल में सबेरे आठ बजे ही मरीजों का तांता लगा था। मुझे कुत्ते वाला इंजेक्शन लगवाना था। इससे पहले दो बार लग चुका था, यह तीसरा वाला था। अफसोस, पूरे दो घंटे की मशक्कत के बाद भी इंजेक्शन नहीं लग सका। 
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अस्पताल में जाकर पता चला कि फार्मासिस्टों की हड़ताल है। इससे पहले जब मैं पिछले वाले इंजेक्शन के लिए बीते 16 सितंबर को अस्पताल गया था, उस दिन भी हड़ताल थी। लेकिन आज फिर वही समस्या थी। हैरानी की बात यह थी कि इंजेक्शन कक्ष के दरवाजे के पास दीवार में एक नोटिस लगा था, जिसमें 19 सितंबर तक की हड़ताल का संदेश दिया गया था। आज 20 तारीख थी, आज तो इंजेक्शन लगना चाहिए, यह सोचकर मैं इधर-उधर देखने लगा। मेरी तरह और भी लोग शायद यही सोच रहे थे और मायूस खड़े थे।

मैंने सीएमएस ऑफिस की ओर रुख किया। वहां सीएमएस दिनेश शर्मा मौजूद नहीं थे। वे कुछ देर बाद आए। तब तक मैं इजेक्शन कक्ष के दो-तीन चक्कर और लगा चुका था। थोड़ी देर बाद सीएमएस साहब मिले। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया और हड़ताल के बारे में सवाल किया तो वे उखड़ गए। ऑफिस में एक शख्स मौजूद था, वह भी मेरे कुछ बोलने से पहले ही नसीहतें देने लगा। मैंने सीएमएस साहब और उस शख्स से जिरह की तो सीएमएस साहब व्यक्तिगत तौर पर मुझे इंजेक्शन लगवाने के लिए राजी हो गए। 
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तब तक फार्मासिस्टों के एचओडी सतीश कुमार वहां हाजिरी लगाने आ चुके थे। सीएमएस साहब ने उनसे कहा कि ये मीडिया वाले हैं, इन्हें कुत्ते वाला एक इंजेक्शन लगा दो। सतीश कुमार ने हड़ताल का हवाला दिया। सीएमएस साहब ने फिर इशारे में उनसे याचना की कि मुझे इंजेक्शन लगा दिया जाए। बल्कि उन्होंने कहा कि यहीं दफ्तर में ही इजेक्शन लाकर लगा दो। मैं बैठा रहा। करीब 15 मिनट बाद एक और शख्स ऑफिस में दाखिल हुआ तो सीएमएस साहब ने उससे कहा कि इनके साथ आप इमरजेंसी जाकर इंजेक्शन लगवा लीजिए। मैं उसके पीछे गया तो वह दरवाजे से बाहर निकलते ही किसी और से बात करने में मशगूल हो गया। मैं खड़ा था। दो मिनट गुफ्तगूं करने के बाद वह मुझसे बोला कि आप चलिए मैं आता हूं। 

मैंने कहा कि सीएमएस साहब ने मुझे आपके साथ जाने के लिए बोला है। पहले वह बौखलाया फिर गुस्से में बोला चलो।



मैं उस शख्स के साथ इमरजेंसी पहुंचा तो वहां इजेक्शन लगाने से इनकार कर दिया गया। इनकार करने वाले फार्मासिस्टों के एचओडी सतीश कुमार ही थे। बोले, कहा होगा सीएमएस साहब ने, इंजेक्शन नहीं लगेगा। तभी एक महिला कमरे में दाखिल हुई और बिना पूरी बात जाने वह बदतमीजी से पेश आने लगी।

मैं फिर से सीएमएस साहब के कक्ष की ओर बढ़ा। इस बार तो मैं सीएमएस साहब की हरकतें देखकर हतप्रभ था। बल्कि मुझे उन पर तरस भी आ रहा था। वह अपने कुछ जूनियर कर्मचारियों से यह सलाह-मश्विरा कर रहे थे कि यार, पता कर लो कि बाकी अस्पतालों में भी ऐसी ही हड़ताल है, या नहीं। उन्होंने खुद तब तक एमएमजी जिला अस्पताल फोन कर दिया और स्थिति के बारे में पूछा। वहां से कहा गया कि दवाएं बंट रही हैं और इंजेक्शन भी लगाए जा रहे हैं। ऐसा उन्होंने ही बताया था। 

तभी कमरे में मौजूद एक शख्स बोले कि हड़ताली फार्मासिस्टों को कोई हक नहीं कि सरकारी प्रोपर्टी पर ताला लगाएं और चाबी अपने पास रख लें। उसने कोर्ट का हवाला देते हुए दो-तीन कानून और गिना दिए। कमरे में एक यादव जी भी मौजूद थे जो कानून की दलीलों को नकार रहे थे और हड़ताल के तरीके को जायज ठहरा रहे थे, और सीएमएस साहब उनकी बातें सुन रहे थे। 

सीएमएस साहब पर तरस इसलिए और आ रहा था कि जब मैंने उन्हें बताया कि इंजेक्शन कक्ष के बाहर लगे नोटिस में 19 सितंबर तक हड़ताल की बात कही गई है, जबकि आज 20 तारीख है तो इंजेक्शन लगना चाहिए। उन्होंने पहले तो हां में हां मिलाई फिर किसी को फोन कर बोले ही हड़ताल का नया नोटिस लगाओ जिसमें लिखो कि अनिश्चित कालीन हड़ताल है और दवाएं और इंजेक्शन भी नहीं लगेंगे। फिर मुस्कुराते हुए मुझसे बोले कि अब कन्फ्यूजन नहीं होगा। लेकिन आप परेशान मत होइए, आपको व्यक्तिगत तौर पर इंजेक्शन लगवा देता हूं।

मैं बैठकर इंतजार कर रहा था। तभी कुछ लोगों का झूपड़ आफिस में दाखिल हो गया। ये वही लोग थे जो हड़ताल कर रहे थे। सीएमएस साहब ने उनसे कक्षों की चाबी मांगी। तो वे साफ मुकर गए और शोर मचाते हुए वहां से चले गए।

आखिर में सीएमएस साहब मुझसे बोले कि यार कुत्ते वाला इंजेक्शन है, और तीसरा लगना है तो एक-दो दिन में लगवा लेना। हैरानी की बात यह थी कि वे मेरा पर्चा लेकर सामने कुर्सी पर बैठे एक शख्स से इंजेक्शन के बारे में पूछने लगे कि देखना यार एक-दो दिन बाद लग सकता है क्या? उसने भी बड़े ही आत्मविश्वास से कहा कि हां जरूर, क्यों नहीं।

मेरी आंखों में नींद भरी थी, वो अब तक छू मंतर हो चुकी थी। सिर थोड़ा चकराया हुआ था। गुस्सा भी आ रहा था और मायूसी तो थी ही। मैंने सीएमएस साहब की बात सुनी और फिर अपने सर को फोन किया। मैंने हमारे डीएनई योगेद्र सर से इस बेतुकी हड़ताल की वजह से होने वाली दिक्कत पर खबर बनाने के लिए पूछा। हरी झंडी मिलते ही मैंने फिर से पूरे अस्पताल का चक्कर लगाया और लोगों से उनकी समस्याएं पूछीं। 


अब तक दिन के साढ़े दस बज चुके थे, और कई डॉक्टरों के कक्षों में अब भी ताला लगा था। मरीजों का बुरा हाल था। कुछ तो ऐसे थे कि जहां जगह मिली वहीं फैल गए। कराहते हुए लोगों को देखने के लिए भी बहुत हिम्मत चाहिए। 75 वर्षीय सत्य प्रकाश दवाएं लेने के लिए खड़े थे, लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी। मैंने उनसे बात की तो वे भी बड़ी मायूसी से बोले, कि वही बताते हैं कि हड़ताल है। पता नहीं कब तक जे हड़ताल चलेगी।

मेरे फोटो खींचने और चहल-कदमी ने अस्पताल आए कुछ बीमार युवाओं का ध्यान खींचा। मैंने उनसे हालचाल पूछा तो उन्होंने भी हड़ताल और डॉक्टरों के गैर-जिम्मेदाराना रवैए का राग गाया। 

एक मुल्ला जी भी तेजी से मेरी ओर आए और पूछने से पहले ही बताने लगे कि साहब बुरा हाल है, बहुत परेशान हैं। डॉक्टर ही नहीं आए हैं। तीन दिन से चक्कर लगा रहे हैं। उनकी बात और आंखों में गुस्सा साफ देखा जा सकता था।


एक साहब इंजेक्शन कक्ष के पास अब भी इंतजार कर रहे थे। मैंने उन्हें बताया कि आज हड़ताल की वजह से इंजेक्शन लगाने के लिए मना कर दिया गया है। वह भी गुस्से से झल्ला गए। बोले सुबह एक चक्कर लगा गया था। अब काफी देर से बैठा हूं। कल भी आया था। बताओ अब भला रैबीज के इंजेक्शन में देर करनी चाहिए। मैंने उनसे कहा कि आप किसी डॉक्टर या सीएमएस साहब से सलाह ले लें और बहुत जरूरी हो तो बाहर लगवा लें।

वहीं पास में बैठीं करीब 70 वर्षीय राजो देवी पर ध्यान गया। मैंने उनसे पूछा तो बोलीं इंजेक्शन लगवाने आई हूं। मैंने जब उन्हें भी सारी स्थिति से अवगत कराया तो बड़ी मायूस हो गईं।

वहीं, काउंसर साहब मुकेश यादव जी को जब पता चला कि मैं पत्रकार हूं और अमर उजाला में काम करता हूं तो मेरा फोन नंबर लेना नहीं भूले और न ही मुझे मिस कॉल देना। 

मैं हड़तालियों से मिला। एक नए हड़ताली ने इशारा कर बताया कि वो जो फोन पर बात कर रहे हैं वही आपको सारी जानकारी देंगे। मैं उनसे मिला। उन्होंने मुझे अपना नाम रामेंद्र बताया और कोई महासचिव का पद बताकर एक मैडम पूजा से मुखातिब करा दिया। मैडम को जैसे ही पता चला कि मैं अमर उजाला से हूं तो बड़ी खुश हुईं और अभिवादन किया।

मैंने उनसे हड़ताल का कारण पूछा तो कोई छह सूत्री कारण बताने लगीं, तीन कारण गिनाते हुए अटक गई तो रामेंद्र जी ने उन्हें एक कागज थमा दिया। मैडम बोली मैं बहुत खुश हूं कि हमारी मांगों को सरकार ने मान लिया है और हमारी जीत हुई है।


मैंने उनसे सवाल किया कि बीमारियों के इस सीजन में क्या ऐसी हड़ताल जरूरी है कि बेसिक दवाएं और इंजेक्शन तक बंद कर दिए जाएं। इस पर मैडम मरीजों से क्षमा मांगने लगीं और बोलीं कि हड़ताल तो जरूरी है। इसके बाद मैडम ने अपने शागिर्दों के साथ एक ग्रुप फोटो भी खिंचाई। रामेंद्र जी बोले कि फोटो अखबार में छपेगी, मैंने उन्हें बताया कि डिजिटल में छपेगी। अस्पताल से निकलते वक्त एक डॉक्टर साहब मुझे देखकर हंसने लगे और तफरी लेने की कोशिश की। मैंने फाइनली एंट्री गेट की फोटो ली और घर आ गया। लेकिन आज की जद्दोजदह ने बहुत थकाया। भगवान, इन थके हुए, लापरवाह और गैर-जिम्मेदार अस्पतालों का भला करे। जहां, इलाज करने वालों की बड़ी तादात लापरवाह और गैर-जिम्मेदार हो तो वहां अस्पताल को ही लापरवाह और गैर-जिम्मेदार ठहराने में हर्ज कैसा। 

आप लोगों को ये लग सकता है कि मैंने यह पूरा वृतांत पत्रकार होने के नाते खुन्नसवश लिख दिया। माफ करना, समस्या मेरी अकेले की नहीं थी, और बीमारों, लाचारों के देखकर करता भी क्या। कम से कम इसके बारे में लिखकर अपना दायित्व तो निभा ही सकता हूं। बाकी काम अब संज्ञान लेने वालों का है।
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