फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

तीन तलाक पर जीत हासिल करने वाली इशरत अपनों के बीच बेगानी क्यों हो गईं

Fri, 27 Jul 2018 07:13 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
विज्ञापन
ishrat-jahan
विज्ञापन
‘इशरत जहां’ जिसने सदियों से चली आ रही तीन तलाक की परंपरा के खिलाफ न केवल लड़ाई लड़ी, बल्कि उसे सुप्रीम कोर्ट में खत्म भी करा दिया। अब वही इशरत अपनों के बीच बेगानी सी हो गई है। उसके अपने समुदाय के लोग उससे दूरी बनाने लगे हैं। इशरत जब किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में जाती है, तो उसे पथ से विचलित करने वाले कमेंट सुनने को मिलते हैं। इन सबके बावजूद वह अपनी राह से विचलित नहीं हो रहीं। इशरत का कहना है कि अभी उसने अदालती लड़ाई जीती है, मगर जमीनी जंग बाकी है। अब वह इसी की तैयारी कर रही है। कोई साथ दे या न दे, मेरा बेटा जो कि मेरे पास है, कुछ वर्षों बाद वह इसे आगे बढ़ाने में मेरी मदद करेगा।
विज्ञापन


कस्तूरबा गांधी मार्ग पर शुक्रवार को महाराष्ट्र भवन में एनआरआई मैरिज एवं वुमन ट्रैफिकिंग विषय पर आयोजित एक वर्कशॉप में भाग लेने आईं इशरत जहां ने अमर उजाला डॉट कॉम से विशेष बातचीत में यह बात कही है। इशरत के मुताबिक, हमारा समाज तीन तलाक जैसी घिनौनी परंपरा खत्म होने से खुश नहीं है।

जिन महिलाओं को इस परंपरा की आड़ में इतने लंबे समय तक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा, वे भी खुल कर सामने नहीं आ रही हैं। चूंकि अभी हमारा समाज कहीं न कहीं पुरुष प्रधान ही माना जाता है, इसलिए महिलाओं को काफी हद तक पुरुषों के पीछे चलना पड़ता है। कई महिलायें मुझसे कहती हैं कि उन्होंने तील तलाक जैसे कलंक को खत्म कर अच्छा काम किया है, लेकिन जब यह बात सार्वजनिक तौर पर कहने की बात आती है तो वे कदम पीछे खींच लेती है।
विज्ञापन
विज्ञापन

तीन तलाक
जंग तो जीतनी है, चाहे जो भी हो
इशरत कहती है कि सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर ऐतिहासिक फैसला देकर उसे खत्म कर दिया है, लेकिन अभी इसका फायदा ज्यादा महिलाओं को नहीं मिल पा रहा है। इस फैसले को धरातल पर उतरने में अभी वक्त लगेगा। उनके लिए कोर्ट की लड़ाई खत्म हुई है, मगर एक दूसरी जंग शुरू हो गई है। वे देश के सभी हिस्सों का दौरा कर मुस्लिस समुदाय की महिलाओं को जागरूक करेंगी।

महिलाओं के बीच जाकर उन्हें समझाएंगी कि यह फैसला उन्हें नरक से बाहर निकालने जैसा है। बिहार के नवादा में रह रहे मेरे मां-बाप इस लड़ाई में मेरे साथ हैं। दूसरे परिजन एवं समुदाय के लोग अभी साथ नहीं आ रहे हैं, लेकिन उसे उम्मीद है कि वे एक दिन मेरा साथ देंगे। मेरी तीन बेटियां अपने पिता के पास रहती हैं, जबकि बेटा नौ वर्षीय मोहम्मद जैद मेरे पास है। मैं उसे स्कूली पढ़ाई के अलावा समुदाय और परंपराओं की जानकारी भी देती हूं। आज मैं यकीन से कह सकती हूं कि वह इस लड़ाई में मेरा साथ देगा। 

मकियों से नहीं डरने वाली
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद दुनिया भर के देशों में उसे सराहना मिली, मगर अपने देश में खुद मेरे समुदाय के लोगों द्वारा सराहना कम और और गालियां ही ज्यादा मिली हैं। कई जगहों पर अपने लोग ही नारेबाजी कर देते हैं, धमकियां भी मिलती रहती हैं। समुदाय के कुछ कट्टरपंथी लोग सबक सिखाने की बात करते हैं। खैर कोई बात नहीं, मैं एक बात साफ़ कर देती हूं कि यह लड़ाई चाहे जितनी लंबी हो, मगर मैं इसे जमीन पर लडूंगी और जीतूंगी। पश्चिम बंगाल के हावड़ा में रहने वाली इशरत ने साल 2016 के दौरान सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि उसके पति ने 2014 में दुबई से फोन पर तीन बार तलाक कह कर उसे तलाक दे दिया।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें