दक्षिण गोवा में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लोगों में विधानसभा चुनाव को लेकर निराशा का भाव है। आदिवासियों का मानना है कि हर बार चुनाव में उनका इस्तेमाल वोट बैंक की तरह किया जाता है। सेनगुएम और केनकोना तालुका के गांवों में रहने वाले इन आदिवासियों की मूलभूत सुविधाओं की मांग भी अभी तक पूरी नहीं हो सकी है।
गोवा की आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी 12 फीसदी है। ये आजीविका के लिए खेती पर निर्भर हैं। आदिवासियों का कहना है कि पुर्तगालियों से आजाद होने के 55 साल बाद भी हालात जस के तस हैं। बारशेम गांव के विकास गूनो वेलिप का कहना है कि चुनाव के वक्त नेता आते हैं, वोट मांगते हैं लेकिन हमारी जिंदगी में कुछ नहीं बदलता है।
इस गांव के 90 फीसदी लोग आदिवासी हैं और यहां गर्मी में भीषण जल संकट पैदा हो जाता है। गांव में पाइप से पानी सप्लाई की कोई व्यवस्था नहीं है। केनकोना क्षेत्र से पिछले चुनाव में रमेश तवाडकर जीते थे जो कि मनोहर परिकर से लेकर लक्ष्मीकांत पारसेकर के कार्यकाल तक में मंत्री रहे। हाल ही में टिकट न मिलने पर उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया।
तवाडकर खुद भी आदिवासी हैं लेकिन आदिवासियों के लिए आरक्षित 2300 रिक्त पद अभी तक राज्य में भरे नहीं गए हैं। फॉरेस्ट एक्ट में संशोधन की आदिवासियों की मांग पर अभी तक कुछ नहीं किया गया है। इसी तरह तमाम अन्य स्थानीय मांगें भी लंबे समय से अधूरी पड़ी हुई हैं।