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Assam: भैंस और बुलबुल की लड़ाई को लेकर बनाई गई असम सरकार की एसओपी रद्द, हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला

Wed, 18 Dec 2024 12:09 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी

सार

भैंसों और बुलबुल पक्षी की लड़ाई का खेल सदियों से असम की संस्कृति और परंपरा का एक अभिन्न अंग रही है। यह मुख्य रूप से माघ बिहू उत्सव के दौरान मनाया जाता है। साल 2014 से इसे बंद कर दिया गया था। पीठ ने कहा कि भैंस और बुलबुल की लड़ाई के खेल के लिए दिसंबर 2023 में राज्य सरकार की ओर से बनाई गई एसओपी विभिन्न वन्यजीव संरक्षण कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है।
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गौहाटी हाईकोर्ट। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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असम में भैंसों और बुलबुल पक्षियों की लड़ाई के खेल के आयोजन को लेकर राज्य सरकार की ओर बनाई गई  मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) को गौहाटी हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार की एसओपी विभिन्न वन्यजीव संरक्षण कानून का उल्लंघन है।

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सदियों से असम की परंपरा का हिस्सा
भैंसों और बुलबुल पक्षी की लड़ाई का खेल सदियों से असम की संस्कृति और परंपरा का एक अभिन्न अंग रही है। यह कार्यक्रम अहोम शासन के दौरान विशेष रूप से रंग घर में औपचारिक रूप से आयोजित किया गया था। यह मुख्य रूप से माघ बिहू उत्सव के दौरान मनाया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने जानवरों को पहुंचने वाली चोटों को ध्यान में रखते हुए इस तरह की प्रथाओं को अस्वीकार कर दिया था। साल 2014 से इसे बंद कर दिया गया था। दोनों कार्यक्रम राज्य सरकार द्वारा निर्धारित मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) के पालन के तहत इस साल जनवरी में फिर से शुरू किए गए थे।

कोर्ट ने क्या कहा
हाईकोर्ट में जस्टिस देवाशीष बरुआ की पीठ ने पेटा इंडिया द्वारा दायर याचिकाओं के जवाब में असम सरकार की एसओपी को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा कि भैंस और बुलबुल की लड़ाई के खेल के लिए दिसंबर 2023 में राज्य सरकार की ओर से बनाई गई एसओपी विभिन्न वन्यजीव संरक्षण कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि असम सरकार को इन लड़ाई के खेलों को अनुमति देने के लिए कानूनों में संशोधन करना चाहिए था। अन्य राज्यों ने भी यही किया है। मगर कार्यकारी आदेश जारी करके मौजूदा प्रावधानों पर काबू पाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि दिसंबर 2023 की अधिसूचना को रद्द किया गया है। असम राज्य को पशु कल्याण के लिए अधिनियमों का उचित अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।
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याचिकाकर्ता की ओर से दी गई दलील
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील दिगंता दास ने अदालत में कहा कि भैंस और बुलबुल की लड़ाई पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 का उल्लंघन करती है। इसके अलावाबुलबुल की लड़ाई वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 का भी उल्लंघन करती है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि भयभीत और गंभीर रूप से घायल भैंसों की पहले पिटाई की जाती है और फिर लड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। जबकि भूखे और नशे में धुत बुलबुल को भोजन के लिए लड़ने के लिए मजबूर किया गया था।

सीएम ने लिया था भाग
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने जनवरी में भैंस और बुलबुल दोनों की लड़ाई में भाग लिया था। उन्होंने कहा था कि अपनी विरासत को संरक्षित करना और आगे बढ़ाना हमारा कर्तव्य है, लेकिन जिम्मेदारी के साथ यह काम होना चाहिए। 

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