दिल्ली की एक अदालत के उस आदेश के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है, जिसमें सोनिया गांधी का नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के मामले में जांच की मांग वाली याचिका पर दोबारा सुनवाई का निर्देश दिया गया है। भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस को 'लोकतंत्र का चोर' बताते हुए कई सवाल उठाए।
दरअसल, दिल्ली की अदालत ने सोमवार को मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सोनिया गांधी का नाम मतदाता सूची में कथित तौर पर गलत तरीके से शामिल किए जाने के मामले में जांच से इनकार किया गया था। विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने कहा कि मजिस्ट्रेट अदालत ने संज्ञेय अपराध के खुलासे से जुड़े पहलू पर अपना मुख्य दायित्व पूरा नहीं किया।
अदालत ने मामले को वापस मजिस्ट्रेट अदालत के पास भेजते हुए बीएनएसएस की धारा 175(3) की आवश्यकताओं के अनुसार नया और स्पष्ट आदेश पारित करने को कहा है। साथ ही शिकायतकर्ता की दलीलों पर नए सिरे से सुनवाई के निर्देश दिए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।
BJP ने कांग्रेस पर लगाए गंभीर आरोप
अदालत के आदेश के बाद भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि ये लोकतंत्र के चोर हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जो लोग वोट चोरी की बात करते हैं, उनके सत्ता में रहते हुए कथित तौर पर लोकतंत्र की चोरी हुई। भंडारी ने कहा कि भारतीय कानून के तहत चुनाव में मतदान का अधिकार भारतीय नागरिक को होता है। उन्होंने दावा किया कि सोनिया गांधी का नाम उस समय मतदाता सूची में शामिल किया गया था, जब उन्होंने भारतीय नागरिकता हासिल नहीं की थी।
भाजपा प्रवक्ता ने सवाल उठाया कि यदि सोनिया गांधी उस समय भारतीय नागरिक नहीं थीं तो उनका नाम मतदाता सूची में कैसे शामिल हुआ और उन्होंने वोट कैसे डाला? उन्होंने यह भी सवाल किया कि कथित दस्तावेज किसने तैयार किए और क्या तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार की इसमें कोई भूमिका थी।
अदालत के आदेश का मतलब क्या है?
दिल्ली की अदालत का मौजूदा आदेश किसी आरोप को साबित करने वाला अंतिम फैसला नहीं है। अदालत ने निचली अदालत के आदेश को रद्द कर मामले पर कानून के मुताबिक नए सिरे से विचार करने को कहा है। इसलिए सोनिया गांधी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की सत्यता पर अंतिम निष्कर्ष अभी नहीं निकला है।
इससे पहले भी सोनिया गांधी की नागरिकता को लेकर अदालतों में मामले सामने आ चुके हैं। 2001 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आए एक मामले में दर्ज न्यायिक रिकॉर्ड में कहा गया था कि उन्हें 30 अप्रैल 1983 को नागरिकता अधिनियम की धारा 5(1)(c) के तहत भारतीय नागरिक के रूप में पंजीकृत किया गया था और उस नागरिकता प्रमाणपत्र को रद्द या वापस लिए जाने का उल्लेख नहीं था।