गठबंधन विरोधी दलों की ये थी दलील
गठबंधन विरोधी नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष को कहा कि अगर पार्टी शिवसेना के साथ सरकार बनाती है तो न सिर्फ महाराष्ट्र में बल्कि पूरे देश में धर्मनिरपेक्षता के साथ उसका वैचारिक प्रतिष्ठान ध्वस्त हो जाएगा और वामदलों, सपा, बसपा और एमआईएम जैसे दलों को कांग्रेस के खिलाफ प्रचार का एक बड़ा हथियार मिल जाएगा जिसका नुकसान पार्टी को केरल, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश,बिहार, असम, महाराष्ट्र, गुजरात, प.बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना में खासा होगा। जबकि कांग्रेस के कुछ नेता भाजपा के विजय रथ को रोकने और महाराष्ट्र जैसे बड़े और अहम राज्य को उससे छीनने के लिए शिवसेना से हाथ मिलाने के पक्ष में थे। कांग्रेस की इसी उहापोह ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का मौका दे दिया।
उधर शिवसेना के साथ गठबंधन की संभावना खत्म होते देख कांग्रेस नेता और लगातार दो बार कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ चुके आचार्य प्रमोद कृष्णम ने पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह से बात करके उनसे आग्रह किया वह इस मामले में पहल करके नेतृत्व को राजी करें।सूत्रों के मुताबिक दिग्विजय ने कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकार और कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल से बात की। पटेल भी गठबंधन के हक में थे।उन्होंने महाराष्ट्र के प्रमुख कांग्रेस नेताओं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण, पृथ्वीराज चह्वाण, प्रदेश अध्यक्ष बाला साहब थोराट, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे से बात करके उन्हें इसके लिए तैयार किया कि वह कांग्रेस अध्यक्ष को जमीनी हालात से अवगत कराएं।
इसके बाद अहमद पटेल ने इन सारे नेताओं को सोनिया गांधी से मिलवाया। फिर जयपुर में एक होटल में मौजूद सभी पार्टी विधायकों से सोनिया और प्रियंका की बात कराई गई। कुल 44 में से 40 से ज्यादा विधायकों ने शिवसेना एनसीपी कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में राय दी और यह भी कहा कि अगर कांग्रेस सरकार में शामिल नहीं हुई तो कितने विधायक कांग्रेस में रहेंगे कोई कुछ नहीं कह सकता। विधायकों के दबाव और महाराष्ट्र के कांग्रेस नेताओं के आग्रह ने गठबंधन विरोधी नेताओं के तर्कों को हल्का कर दिया और सोनिया गांधी ने गठबंधन को मंजूरी दे दी। इसके बाद फौरन अहमद पटेल के.सी वेणुगोपाल और मल्लिकार्जुन खड़गे मुंबई गए और शिवसेना कांग्रेस एनसीपी नेताओं की संयुक्त बैठकों का दौर शुरू हुआ जो आगे चलकर महाविकास अघाड़ी का जन्म हुआ।