एल रॉबिन्स की अर्थशास्त्र की किताब में जो अर्थशास्त्र का मूल बताया गया है, वह सीमित संसाधनों में साधनों और क्षमता का प्रचुर उपयोग बताया गया है। भाजपा नेता, पूर्व केन्द्रीय कृषि मंत्री, योजना आयोग के पूर्व सदस्य सोमपाल शास्त्री का कहना है कि मुझे नहीं लगता केन्द्र सरकार इस आधारभूत वाक्य का अर्थ समझ पाती है। पिछले सात वर्ष से लगातार मांग का स्तर गिर रहा है। इसका गिरना सरकार की समझ को बता रहा है।
इस समय कोविड-19 के संक्रमण की स्थिति में आम आदमी तंग, परेशान है। झांडिय़ों में महिलाएं बच्चे को जन्म देकर भी अपने घर गांव जाने के लिए मजबूर हैं और सरकार असंवेदनशीलता का एक के बाद एक उदाहरण प्रस्तुत कर रही है।
- राहत पैकेज नहीं भूख से मर गए आदमी के मृत शरीर पर घी लगाना है यह
प्रधानमंत्री ने 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा कर दी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसे किस्तों में बता रही हैं। यह कैसा राहत पैकेज है? यह दवा के अभाव में या भूख से मर रहे आदमी को उसकी शादी कराने और रहने के लिए महल देने का सपना दिखाने जैसा है।
मुझे कहना होगा तो गांव-देहात की भाषा में कहूंगा कि रोटी के निवाले के लिए मर गए आदमी के मृत शरीर पर घी चुपड़कर सरकार सहानुभूति का लाभ लेने में जुटी है। अफसोस हो रहा है कि सरकार को वह छोटे-छोटे बच्चे, महिलाएं, गरीब, मजदूर परिवार की बेबसी दिखाई नहीं पड़ रही है। लोग हाथ की गाड़ी बनाकर, बैग को बच्चों की सवारी बनाकर हजारों किमी दूर से पैदल अपने घर के लिए निकल पड़े हैं।
- प्रधानमंत्री की एक अंगुली पर पूरा देश नाच गया
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लॉकडाऊन की घोषणा की और पूरा देश उनकी एक अंगुली पर नाच गया। हर आदमी ने खुलकर देश का साथ दिया। जबकि विदेशों में लॉकडाऊन को लेकर लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन जब गरीब, मजदूर, आम आदमी से नहीं सहा गया तो अब वह पैदल ही घर की तरफ निकल पड़ा है।
वहीं केन्द्र सरकार लगातार एक के बाद एक गलतियां कर रही है। वह लोगों के हाथ में राहत देने, पैसे या संसाधन के सहयोग की बजाय इस तरह से कर्ज लेने की घोषणा कर रही है। उसे किसान का दर्द नहीं दिखाई पड़ रहा है जिसके फल, फूल, सब्जी, दूध, फसल के खराब होने, दाम गिर जाने से बदहाली की स्थिति आ रही है। मछली पालन के लोग परेशान हैं। गाय, भैंस पालने वालों के दूध के भाव गिर चुके हैं। बाजार से मांग और सप्लाई चैन टूट चुकी है।
केन्द्र सरकार ने तीन बड़ी भूल की। पहली बड़ी भूल पहला लॉकडाऊन लगाने के समय हुई। यह फसल का समय था। इस समय खेतिहर मजदूर, गरीब एक बार अपने गांव लौटता है। उसके पास जो भी छोटी-मोटी खेती की जमीन है, उसकी फसल काटता है, गांव में काम करके साल भर के परिवार के खाने का इंतजाम करता है और फिर काम करने शहर, महानगर की ओर लौट आता है।
सरकार को चाहिए था कि उन्हें बताती कि कोविड-19 की महामारी के कारण वह लॉकडाऊन करने वाली है। जो लोग जाना चाहते हैं, 5-7 दिन के भीतर अपने घर की तरफ चले जाएं। जो लोग बाहर घूमने या काम के इरादे से गए हैं, वह भी लौट आते। लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। अचानक लॉकडाऊन की घोषणा करके सबको फंसा दिया। यह सरकार की पहली बड़ी गलती थी। फिर भी देश की जनता ने प्रधानमंत्री का साथ दिया।
प्रधानमंत्री खुद इसका ठीक से मूल्यांकन नहीं कर पाए। यह दूसरी बड़ी गलती है। 14 दिन के लॉकडाऊन (इनकुबेशन पीरियड)के बाद 28 दिन का लॉकडाऊन फिर लगा। इसके बाद लॉकडाऊन का कोई मतलब नहीं है। लेकिन इतने दिन में सरकार कुछ खास नहीं कर पाई। यह तीसरी गलती थी। यह एक ऐसी स्थिति है कि जब लोग बर्दाश्त नहीं कर पाए और घरों के लिए निकल पड़े हैं।
मुद्दे से ध्यान न भटकाए, अर्थव्यवस्था खोले सरकार
सोमपाल शास्त्री ने कहा कि केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह मुद्दे से ध्यान न भटकाकर अगली गलती न करे। वह छूट दे व्यवस्था को खोले। लोगों को अपने बल पर काम करने, उठ खड़े होने का अवसर दे दे। सरकार यह नहीं कर रही है। वह प्रतिबंध लगाकर 15000 रुपये कमाने वाले को 1500 रुपये कमाने का सपना दिखा रही है। मैं तो यही कहूंगा कि केन्द्र सरकार अर्थ व्यवस्था की रीढ़ तोड़ रही है।