संविधान की मूल प्रति को अपने हाथों से उकेरा था, उस समय के प्रख्यात कैलिग्राफर (सुलेखक) प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने। कैलिग्राफी रायजादा को पारिवारिक विरासत में मिली थी। उनके दादा भी यही काम करते थे। रायजादा ने इटेलिक शैली में बेहद खूबसूरती से संविधान लिखा, जिसमें उन्होंने एक भी त्रुटि नहीं की। खास बात यह है कि रायजादा ने तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरु से साफ कह दिया कि वो संविधान लिखने के लिए एक भी पैसा नहीं लेंगे। बस हरके पन्ने पर उनका नाम और अंतिम पृष्ठ पर स्वयं के साथ उनके दादा का नाम लिखने की इजाजत दी जाए, जिसे नेहरू ने मान लिया। रायजादा को सुलेख के लिए सरकार ने संविधान भवन में अलग से कक्ष उपलब्ध कराया। रायजादा के सुलेख और संविधान के हरेक पन्ने को संवारने का काम शांतिनिकेतन के कलाकारों ने किया। इनमें नन्द लाल बोस और उनके शिष्य प्रमुख थे।
संविधान को हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में लिखवाया गया। इनकी मूल प्रतियां संसद भवन के पुस्तकालय में हीलियम गैस से भरे कांच के शोकेस में रखी हुई हैं। इस शोकेश को राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला और अमेरिका के गेटी संरक्षण संस्थान द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया था।
संविधान की पांडुलिपि एक हजार साल तक बचे रहने वाले सूक्ष्मीजीवी रोधक चर्मपत्र की शीट पर लिखी गई। इसका आकार 45.7 सेमी × 58.4 सेमी है। पांडुलिपि में 234 पृष्ठ शामिल थे, जिसका वजन 13 किलो था।
संविधान सभा में बहस और चर्चा के लिए जो मसौदा रखा गया, उसमें करीब 2000 संशोधन किए गए थे।
संविधान सभा के कुल 11 सत्र हुए। 11वां सत्र 14-26 नवंबर तक चला। 26 नवंबर 1949 को हमारे संविधान का आखिरी मसौदा बनकर तैयार हुआ था।
जो संविधान बनकर तैयार हुआ, उस पर संविधान सभा के 284 सदस्यों ने 24 नवंबर 1949 को कॉन्स्टीट्यूशन हॉल में दस्तखत किए थे। इनमें 15 महिला सदस्य थीं।
वैसे तो संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को ही संविधान को पारित कर दिया था लेकिन इसे लागू करने के लिए जानबूझकर 26 जनवरी 1950 की तारीख चुनी गई क्योंकि इसी दिन 1930 में पूर्ण स्वराज की घोषणा हुई थी। इसकी याद में ही संविधान भी 26 जनवरी को ही प्रभावी किया गया।
महान दस्तावेज संविधान की छपाई का काम देहरादून स्थित सर्वे ऑफ इंण्डिया को सौंपा गया, जिसने इसे करीब पांच साल में पूरा किया। तब संविधान की एक हजार प्रतियों प्रकाशित हुई थीं। उस प्रकाशन की एक प्रति संसद के पुस्तकालय में तो एक प्रति आज भी देहरादून में सुरक्षित है।