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शुक्ला देबनाथ: चाय बागान की आदिवासी महिलाओं को बना रहीं आत्मनिर्भर, यंगेस्ट सोशल वर्कर का मिल चुका सम्मान

Mon, 12 Sep 2022 10:02 PM IST
वीरेंद्र शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता

सार

बचपन से ही शुक्ला देबनाथ ने चाय बागान की आदिवासी युवतियों और महिलाओं के दयनीय जीवन को बहुत नजदीक से देखा है। कई बार यहां की महिलाएं नौकरी की तलाश में गलत हाथों में पहुंच जाती हैं। 
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समाजसेवी शुक्ला देबनाथ - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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समाज सेवी शुक्ला देबनाथ दर्जीलिंग के डूवर्स और इसके असपास के चाय बागान की आदिवासी महिलाओं और युवतियों को आत्म-निर्भर बना रही है। पिछले कई वर्षों से ये उनके उत्थान के लिए काम कर रही हैं। इसके साथ ही बच्चों में भी देशभक्ति जगाने का काम करती है। हाल ही में इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड में यंगेस्ट सोशल वर्कर सम्मान से सम्मानित शुक्ला देवनाथ ने अमर उजाला से खास बातचीत करते हुए अपने सपनों को साझा किया।
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वह कहती हैं, मेरा जन्म बंगाल के दार्जिंलिंग के डुवर्स में अलीपुरद्वार जिले के न्यू हासीमारा में हुआ। बचपन से ही मैंने चाय बागान की आदिवासी युवतियों और महिलाओं के दयनीय जीवन को बहुत नजदीक से देखा है। कई बार यहां की महिलाएं नौकरी की तलाश में गलत हाथों में पहुंच जाती हैं। उन्होंने कहा कि, बचपन से ही उनके लिए काम करने के बारे में सोचती थीं। महिलाओं को ऐसा काम दे दूं कि फिर वह किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएं। 

संस्कृत से एमए और बीएड करने के बाद भी उन्होंने नौकरी को नहीं चुना। चुना तो चाय बागान में काम करने वाली आदिवासी महिलाओं और युवतियों के लिए कुछ करने को। वह बताती हैं, 14 साल की उम्र में अपनी साईकिल बेचकर ब्यूटिशयन का कोर्स किया। ताकि आगे चल कर  महिलाओं को कुछ सीखा पाऊं। पिछले 8 वर्षों से मेक-अप आर्टिस्ट और निजी ट्यूटर देबनाथ ने उत्तर बंगाल क्षेत्र के चाय बागानों सुभाषिनी चाय बागान, कलचीनी चाय बागान, मच पारा चाय बागान और चामुर्ची चाय बागान के सैकड़ों गरीब और निराश्रितों को आत्म-निर्भर बना रही हैं।
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गरीबों के लिए मुफ्त शिक्षा, ब्यूटीशियन कक्षाएं और कराटे कोर्स भी करवाती हैं। अब तक करीब तीन हजार से अधिक बेटियों को सशक्त बना चुकी हैं। चाय बागान क्षेत्रों में युवा लड़कियों और महिलाओं को स्टेशनरी और सैनिटरी पैड का वितरण करती हैं। वह कहती हैं कि गरीब महिलाएं सैनिटरी पैड का उपयोग नहीं करतीं। इन्हें जागरूक करने के साथ-साथ सैनिटरी पैड के लिए फ्री में उपलब्ध करा रही हैं। 

उन्होंने कहा कि, कोरोना काल में पैदल चल कर दूर-दराज के इलाकों में दो हजार से अधिक लोगों को भोजन, फल और कपड़ों का वितरण किया। अपने पैसों से गरीब और जरूरतमंद लोगों को कोरोना काल में सु्रक्षा किट प्रदान किए। देबनाथ को सामाजिक गतिविधियों के लिए कई पुरस्कार और सम्मान मिल चुके है। उन्हें हाल ही में इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड में यंगेस्ट सोशल वर्कर का सम्मान मिला। जबकि वह पश्चिम बंगाल में एक लोकप्रिय रियलिटी शो दीदी नंबर वन के एक एपिसोड में भी दिखाई दी हैं। बंगो समाज अवॉर्ड, महिलाओं के जागरुकता के लिए बांग्लादेश की सामाजिक संस्था ने भी उनको सम्मानित किया।

महिलाओं को शोषण से चाहती है बचाना 
उन्होंने कहा कि अक्सर देखने में आता है कि गरीब और कम पढ़ी-लिखी महिलाएं शोषण का शिकार हो जाती हैं। नौकरी देने के नाम पर महिलाओं के साथ अभद्रता होती है। ऐसी महिलाओं को काम देकर आत्म निरर्भर बनाना चाहती है। वह घर पर महिलाओं को हस्तशिल्प का हुनर भी सिखाती है। इससे जहां महिलाएं आत्म निर्भर बनेंगी वहीं वे शोषण और मानव तस्करी जैसे जघन्य अपराध से भी बचेंगी।

अपना एक तिहाई हिस्सा गरीबों के लिए रखती हैं
देबनाथ कहती हैं कि गरीब लोगों के कल्याण के लिए अपनी आय में से एक तिहाई हिस्सा अलग से रखती हैं। किसी भी समय उनको रूपयों की जरूत पड़ने पर मदद की जा सके। वह गरीब और असहाय लोगों को ही रोल मॉडल मानती हैं। 
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