सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ता पोलराइजेशन (ध्रुवीकरण) अब लोकतांत्रिक संवाद के लिए गंभीर चुनौती बन गया है। अमेरिका स्थित सोशल साइंस रिसर्च काउंसिल (एसएसआरसी) की ताजा अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने चेतावनी दी है कि एल्गोरिद्म की संरचना इस तरह काम कर रही है कि उपयोगकर्ता लगातार उन्हीं विचारों से जुड़ी सामग्री देखते हैं, जिससे समाज में असहिष्णुता बढ़ रही है और सांस्कृतिक-राजनीतिक विभाजन और गहरे हो रहे हैं। एसएसआरसी की इस रिसर्च में अमेरिका, यूरोप, भारत, ब्राजील और दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़े डाटा का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन के अनुसार चुनावी वर्षों और बड़े राजनीतिक आंदोलनों के दौरान इको चैंबर (गूंज-कोष) का प्रभाव सबसे ज्यादा दिखता है। यहां एक खास विचारधारा से जुड़े उपयोगकर्ताओं को लगातार उसी दिशा की सामग्री मिलती है, जिससे फेक न्यूज और नफरत फैलाने वाले कंटेंट को बढ़ावा मिलता है।
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क्या कहता है अध्ययन?
अध्ययन के अनुसार वैश्विक स्तर पर जो प्रमुख निष्कर्ष निकल कर आए हैं उनमें राजनीतिक ध्रुवीकरण सबसे ज्यादा है। लोग अपने विरोधियों से बातचीत करने के बजाय उन्हें ब्लॉक या अनफॉलो करना ज्यादा पसंद करते हैं। इसी तरह अगर सांस्कृतिक पक्ष को देखा जाए तो धार्मिक और जातीय बहसें अब पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक हो गई हैं। 18 से 30 आयु वर्ग के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं क्योंकि उसकी खबरों का प्रमुख स्रोत सोशल मीडिया है।
विरोधियों को कलंकित करने का औजार
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संजय कुमार का कहना है, भारत में सोशल मीडिया अब केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि विरोधियों को कलंकित करने का औजार बन गया है। यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसाइटी (बेंगलुरु) की शोधकर्ता निशा माथुर ने कहा, चुनावी वार्षों में सोशल मीडिया पर गलत सूचनाओं की बाढ़ आ जाती है। एल्गोरिद्म क्लिक और शेयर वाली सामग्री को प्राथमिकता देते हैं, चाहे वह तथ्यपरक न हो।
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भारत में ध्रुवीकरण की दर बहुत ज्यादा
इस रिपोर्ट में भारत से जुड़े निष्कर्ष काफी चिंताजनक हैं। अध्ययन में पाया गया कि भारत में 62 प्रतिशत सोशल मीडिया उपयोगकर्ता मानते हैं कि ऑनलाइन राजनीतिक चर्चा ने समाज को पहले से ज्यादा विभाजित कर दिया है। वहीं, 18 से 30 आयु वर्ग के 45 प्रतिशत युवाओं ने माना कि वे केवल उन्हीं पेजों और समूहों को फॉलो करते हैं जो उनकी विचारधारा से मेल खाते हैं।
- धार्मिक ध्रुवीकरण : भारत में धार्मिक पहचान से जुड़े कंटेंट को औसतन 70 प्रतिशत ज्यादा रीट्वीट और शेयर किया गया।
- चुनावी समय में असर : 2024 के आम चुनावों और उसके बाद राज्य चुनावों के दौरान फेक न्यूज और हेट स्पीच में सामान्य दिनों की तुलना में तीन गुना वृद्धि हुई।
- युवाओं पर प्रभाव : भारत के 60 प्रतिशत युवाओं ने स्वीकार किया कि उनकी राजनीतिक राय पर सोशल मीडिया का काफी हद तक असर पड़ता है।
- महिला उपयोगकर्ता : महिला यूजर्स को ऑनलाइन बहसों में दुगुना ट्रोलिंग झेलनी पड़ती है।
- भाषाई अंतर : हिंदी और बंगाली भाषा के प्लेटफॉर्म्स पर राजनीतिक ध्रुवीकरण अंग्रेजी की तुलना में 40 प्रतिशत ज्यादा दर्ज हुआ।