बच्चों और किशोरों में सोशल मीडिया की बढ़ती लत को अब ब्रिटेन जैसे देशों में 'सिगरेट' के समान खतरनाक माना जा रहा है। डिजिटल सुरक्षा को लेकर ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कड़े रुख के बाद अब भारत में भी नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। हाल ही में कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने प्रतिबंध की घोषणाएं की हैं, वहीं दिग्गज टेक कंपनियां इन पाबंदियों को रोकने के लिए अरबों रुपये खर्च कर रही हैं। आइए सवाल-जवाब के जरिए इस आर्थिक और नीतिगत पहलुओं को समझते हैं।
भारत में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर राज्य सरकारें आक्रामक रुख अपना रही हैं। कर्नाटक देश का पहला राज्य बन गया है जिसने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने विधानसभा में बजट पेश करते हुए यह अहम एलान किया। इसी तर्ज पर, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने भी अगले 90 दिनों के भीतर 13 साल (या 16 साल) से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस बंद करने की घोषणा की है। इन राज्यों का तर्क है कि डिजिटल लत से बच्चों की मानसिक सेहत, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और सीखने की आदत पर भारी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव भी साफ कर चुके हैं कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और समाज की सुरक्षा के लिए टेक कंपनियों के साथ गंभीर चर्चा चल रही है। सरकार वर्तमान में उम्र-आधारित एक्सेस कंट्रोल लागू करने पर विचार कर रही है। इसके अतिरिक्त, नए डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) कानून में भी बच्चों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2026-27 में भी सोशल मीडिया की लत पर गहरी चिंता जताते हुए उम्र के हिसाब से सीमाएं तय करने की आधिकारिक सिफारिश की गई है।
बच्चों के लिए सोशल मीडिया को बैन करने के मामले में ऑस्ट्रेलिया सबसे आगे है। ऑस्ट्रेलिया ने 10 दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर आधिकारिक प्रतिबंध लागू कर दिया है। नियमों के उल्लंघन पर कंपनियों को 33 मिलियन डॉलर (करीब 300 करोड़ रुपये) तक का जुर्माना देना होगा। इसके अलावा, फ्रांस की नेशनल असेंबली ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन का बिल पास कर दिया है। स्पेन, ग्रीस और पोलैंड भी क्रमशः 16 और 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए डिजिटल पहुंच को ब्लॉक करने के लिए सख्त कानून ला रहे हैं।
अटेंशन इकोनोमी (ध्यान खींचने वाली अर्थव्यवस्था) पर आधारित बिग टेक के बिजनेस मॉडल के लिए सोशन मीडिया बैन एक बड़ा खतरा है। इसे रोकने के लिए टेक दिग्गज आक्रामक लॉबिंग का सहारा ले रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, टेक कंपनियों ने पिछले साल यूरोपीय संघ में राजनेताओं की लॉबिंग पर 151 मिलियन यूरो (करीब 1618 करोड़ रुपये) खर्च किए हैं, जिसमें मेटा ने अकेले 10 मिलियन यूरो खर्चे हैं। कंपनियों की रणनीति पूर्ण प्रतिबंध को टालने की है। वे दलील दे रही हैं कि सरकारों को बैन के बजाय 'टीन अकाउंट्स' जैसे फीचर्स के माध्यम से माता-पिता को नियंत्रण सौंपना चाहिए। ब्रुसेल्स में टेक कंपनियों के 890 फुल-टाइम लॉबिस्ट काम कर रहे हैं। कंपनियों की रणनीति यह दलील देने की है कि पूर्ण बैन के बजाय माता-पिता को नियंत्रण दिया जाना चाहिए। इसके लिए मेटा 'टीन अकाउंट्स' जैसे फीचर्स को प्रमोट कर रही है ताकि सख्त कानूनी ढांचे से बचा जा सके। अल्फाबेट के तहत चलने वाले यूट्यूब ने भी बच्चों के लिए अलग सेगमेंट बना रखा है।