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Supreme Court: कभी-कभी कानून लाना आसान, लेकिन समाज को इसके साथ बदलने के लिए राजी करना मुश्किल

Thu, 29 Sep 2022 09:30 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

न्याय मित्र के रूप में शीर्ष अदालत की सहायता कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यह दोनों तरह से काम करती है, और कभी-कभी कानून सामाजिक बदलाव से पिछड़ जाता है। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media
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विस्तार
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सामाजिक बदलाव में थोड़ा समय लगता है और कभी-कभी कानून लाना आसान होता है लेकिन समाज को इसके साथ बदलने के लिए राजी करना मुश्किल होता है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विवाह टूटने से संबंधित मुद्दे पर विचार-विमर्श करते हुए ये टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि परिवार भारत में विवाह में एक बड़ी भूमिका निभाता है। संविधान का अनुच्छेद 142 शीर्ष अदालत के आदेशों और उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले में पूर्ण न्याय करने के आदेशों को लागू करने से संबंधित है।

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न्यायमूर्ति एस के कौल की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि सामाजिक बदलाव में थोड़ा समय लगता है। इस मामले में न्याय मित्र के रूप में शीर्ष अदालत की सहायता कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यह दोनों तरह से काम करती है, और कभी-कभी कानून सामाजिक बदलाव से पिछड़ जाता है और कभी-कभी कानून इससे आगे होता है। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति ए एस ओका, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी की पीठ ने इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। 

दिन भर की बहस के दौरान जयसिंह ने विवाह कानून (संशोधन) विधेयक, 2010 सहित दो विधेयकों का हवाला दिया और कहा कि इसने कभी दिन का उजाला नहीं देखा। उन्होंने कहा कि बुधवार को बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल अदालत में मौजूद थे और वह उन्हें यह बताने वाली थीं कि विधेयक उनके पास था और उन्हें इस बारे में संसद में बहुत कुछ करने का अवसर मिला था.
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सिब्बल यूपीए शासन के दौरान केंद्रीय मंत्री थे। जयसिंह ने कहा कि विधेयक को बिना किसी मजबूत आंकड़ों के डेटा के संसद में पेश किया गया। जस्टिस कौल ने कहा कि वह कानून लाने में विधायी प्रभाव अध्ययन के बारे में न्यायिक रूप से जोर दे रहे हैं। शायद यह एक ऐसा मामला है जब हम कानून और सामाजिक बदलाव के बारे में बात कर रहे हैं, मुझे अक्सर लगता है कि सामाजिक बदलाव के लिए कानून के साथ तालमेल बिठाना मुश्किल है।  
  
अदालत ने भुखमरी और कुपोषण से होने वाली मौतों के आंकड़े मांगे 
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र से कहा कि वह सामुदायिक रसोई योजना को लागू करने के लिए एक मॉडल योजना के अलावा देश भर में भुखमरी और कुपोषण से होने वाली मौतों के आंकड़े उसके सामने रखे। शीर्ष अदालत ने 18 जनवरी को कहा था कि मॉडल सामुदायिक रसोई योजना का मसौदा तैयार करने और विशेष रूप से इसके लिए अतिरिक्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने की संभावना तलाशने में केंद्र की भूमिका होगी।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल माधवी दीवान ने जस्टिस ए एस बोपन्ना और पीएस नरसिम्हा की पीठ को बताया कि पहले के आदेश के अनुसार सभी राज्य सरकारों से विवरण मांगा जा रहा था, और सामग्री जमा करने और अदालत के समक्ष उचित रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कुछ और समय मांगा। पीठ ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि कुछ राज्यों ने केंद्र को जानकारी प्रदान नहीं की है और एएसजी के अनुरोध को स्वीकार करते हुए 3 नवंबर को आगे की सुनवाई के लिए याचिका सूचीबद्ध की है। शुरुआत में जनहित याचिका याचिकाकर्ता अनु धवन और अन्य की ओर से पेश वकील आशिमा मंडला, ने कहा कि ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भूखे सोने वाले भारतीयों की संख्या 2018 में 19 करोड़ से बढ़कर 2022 में 35 करोड़ हो गई है।

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