बिहार और अब महाराष्ट्र के बाद राज्य दर राज्य अपने सहयोगियों के सामने भाजपा झुकती दिख रही है। यूपी के छोटे-छोटे दल भी भाजपा को अब आंखें दिखा रहे हैं। आखिर सहयोगियों के सामने क्यों नतमस्तक है भाजपा? बिहार में भाजपा पिछली बार 30 सीटों पर लड़ी थी, जिनमें से 22 सीटें जीती थीं, जबकि जद यू अकेले 38 सीटों पर लड़ी पर महज दो सीटें ही जीत पाई।
पिछले महीने समझौते के मुताबिक दोनों दल इस बार 17-17 सीटों पर लड़ेंगे। यानी भाजपा ने पिछली बार की अपनी 13 सीटें जद यू को दे दीं। वहीं, राम विलास पासवान की लोजपा को पिछली बार जीती छह सीटें तो दीं ही एक राज्यसभा सीट भी दे दी।
इसी तरह 2014 के लोकसभा और विधानसभा दोनों ही चुनावों में ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद भाजपा शिवसेना को इस बार विधानसभा में न सिर्फ बराबर-बराबर (144) सीटें देने को तैयार हो गई, बल्कि मंत्रिमंडल में बराबर की हिस्सेदारी और ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद बांटने पर भी राजी हो गई।
यूपी में 2014 में केवल अपना दल को दो सीटें दी गई थीं, लेकिन इस बार अनुप्रिया पटेल ज्यादा सीटें मांग रही हैं। वहीं ओम प्रकाश राजभर अपने लिए दो सीटें मांग रहे हैं। पिछली बार वह भाजपा के सहयोगी नहीं थे। महाराष्ट्र मॉडल ने सब के हौसले बढ़ा दिए हैं। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के गठबंधन में भाजपा को सिर्फ पांच सीटें मिलीं, जबकि डीएमके गठबंधन में कांग्रेस नौ सीटें झटकने में सफल रही।
चुनाव पूर्व गठबंधन से मजबूत होगी दावेदारी
राम विलास पासवान का कहना है कि भाजपा एनडीए गठबंधन को मजबूत कर ज्यादा से ज्यादा सीटें जिताना चाहती है। किसी एक दल को बहुमत न मिलने पर राष्ट्रपति ज्यादा सीटों वाले चुनाव पूर्व गठबंधन को सरकार बनने का न्योता देंगे। इसके अलावा उसे बीजद, टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस से चुनाव बाद समर्थन मिलने की उम्मीद है। पासवान आश्वस्त हैं कि अगली सरकार एनडीए की ही बनेगी।
एनडीए बनाम यूपीए
भाजपा जहां अपनी जीती हुई सीटें छोड़कर भी एनडीए को मजबूत करना चाहती है, कांग्रेस कई राज्यों में सहयोगी दलों के साथ सीट बंटवारे को अब तक अंतिम रूप भी नहीं दे पाई है। साथ ही वह बंगाल में टीएमसी, आंध्र में टीडीपी और यूपी में सपा-बसपा जैसे दलों के खिलाफ लड़ रही है। वहीं कर्नाटक में जद एस के साथ सरकार चला रही है, लेकिन संसदीय चुनाव अलग-अलग लड़ेगी।