आगजनी या सड़क हादसे में घायलों के उपचार को लेकर देश का सबसे बड़ा चिकित्सीय संस्थान एम्स नया मुकाम हासिल करने जा रहा है। एम्स में एशिया का सबसे बड़ा बर्न सेंटर बनकर तैयार हो चुका है, जहां 100 बिस्तरों की सुविधा मरीजों को मिलेगी। इस सेंटर में भर्ती मरीजों के लिए कृत्रिम त्वचा का इंतजाम भी एम्स कर रहा है। जिसमें एम्स की मदद दिल्ली आईआईटी के वैज्ञानिक कर रहे हैं। आईआईटी की ओर से कृत्रिम त्वचा बनाई जा रही है। वहीं एम्स नई इमारत में त्वचा बैंक भी स्थापित करेगा। इसे लेकर कागजी कार्यवाही लगभग पूरी हो चुकी है और एम्स को त्वचा बैंक की मंजूरी भी मिल चुकी है।
सोमवार को एम्स निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने ये जानकारी देते हुए कहा कि इन सभी सुविधाओं के साथ ही हाथों का प्रत्यारोपण, फेशियल इम्प्लांट और चेहरे का प्रत्यारोपण भी एम्स में हो सकेगा। एम्स के बर्न एवं प्लास्टिक सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष सिंघल ने नेशनल बर्न एंव प्लास्टिक सर्जरी डे पर बताया कि एम्स में सालाना करीब 3 से साढ़े 3 हजार मरीज प्लास्टिक सर्जरी के लिए आते हैं। कैंसर के ऑपरेशन के बाद, सड़क दुर्घटना और आगजनी की घटनाओं से पीड़ितों को अक्सर त्वचा की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन कैडेवर डोनेशन कम होने के कारण इस मांग को पूरा नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि देश में हर जगह बर्न एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग होना चाहिए। ताकि मरीजों को समय पर चिकित्सा मिल सके।
अभी तक सफदरजंग अस्पताल में त्वचा बैंक है, लेकिन वह प्रभावी रूप से कार्यरत नहीं है। उन्होंने बताया कि मानव शरीर रसायनों का मिश्रण है। इसीलिए आईआईटी दिल्ली अभी सूअर पर अध्ययन कर रहा है। इसके बाद ट्रायल आगे बढ़ेगा। इसी दौरान आरएमएल अस्पताल में विभागाध्यक्ष डॉ. आरके श्रीवास्तव का कहना है कि त्वचा को लेकर देश में गंभीर हालात हैं। जबकि इससे जुड़ी घटनाएं चरम पर हैं। अगर दिल्ली की ही बात करें तो आए दिन आग की घटनाएं और उसमें लोगों के झुलसने के मामले सामने आ रहे हैं। देश में करीब 8 त्वचा बैंक हैं जबकि जलने के कारण हर साल करीब सात से आठ लाख मरीज अस्पतालों में दाखिल होते हैं। उन्होंने बताया कि करीब 40 फीसदी से ऊपरी जले होने के कारण त्वचा की आवश्यकता पड़ती है।
लोकनायक अस्पताल के बर्न एवं प्लास्टिक सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. पीएस भंडारी बताते हैं कि चेहरा और हाथों के प्रत्यारोपण में सबसे मुश्किल इनका उपलब्ध होना है। केवल कैडेवर डोनेशन से ही इन्हें प्राप्त किया जा सकता है। जबकि सच ये है कि देश में कैडेवर डोनेशन को लेकर काफी पिछड़ापन है। ये चुनौती न सिर्फ डॉक्टर बल्कि सरकार के समक्ष भी है। आम जनता को भी समझना होगा कि अंगदान से लोगों के जीवन बचाए जा सकते हैं।