मणिपुर में बीते एक साल से ज्यादा समय से हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। राज्य की बड़ी आबादी अपने घरों से विस्थापित होकर राहत शिविरों में रह रहे हैं। लोगों को अपनी आजीविका के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में सिंगापुर में रहने वाले एक मणिपुरी उद्यमी मोनिष करम उम्मीद की किरण बनकर सामने आए हैं। मोनिष ने हिंसा प्रभावित महिलाओं की मदद के लिए एक खास पहल शुरू की। उन्होंने महिलाओं को 'क्रोशे' से गुड़िया बनाने का प्रशिक्षण दिया और इन गुड़ियाओं को दुनिया भर में बेचने का मौका दिया है। इस पहल का मकसद राज्य की महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। क्रोशे हस्तकला की एक तकनीक है, जिसमें सूत या धागे से किसी चीज को हाथ से बुना जाता है।
वह बताते हैं कि पिछले साल मई में जब मणिपुर में हिंसा शुरू हुई, तो हजारों लोग अपने घरों से बेघर हो गए और राहत शिविरों में रहने लगे। इनमें से अधिकांश के पास कोई काम नहीं था और वे आर्थिक रूप से परेशान थे। मैंने और मेरे साथियों ने महसूस किया कि इन लोगों को एक स्थिर और आत्मनिर्भर आजीविका की जरूरत है, ताकि वे अपने जीवन को फिर से पटरी पर ला सकें।
उन्होंने ने कहा, मेरी बेटी की बनाई एक छोटी गुड़िया से मुझे प्रेरणा मिली। मणिपुर की महिलाएं पारंपरिक रूप से हात से काम करने में माहिर होती हैं, इसलिए मैंने सोचा कि क्यों न उन्हें इस काम में प्रशिक्षित किया जाए।उन्होंने आगे बताया कि उनकी टीम ने देखा कि राहत शिविरों में रहने वाली महिलाएं मोमबत्तियां, अगरबत्तियां और वाशिंग पाउडर बना रही थीं, लेकिन उन्हें इन उत्पादों को बेचने में बहुत मुश्किल हो रही थी। इसलिए उन्होंने गुड़िया बनाने की परियोजना को आसान बनाने का फैसला किया। जैसे बेचने में मदद करना, ब्रांडिंग, मार्केटिंग का ध्यान हम रखेंगे, ताकि महिलएं केवल गुड़िया बनाने पर फोकस कर सकें।
मोनिष की कंपनी ने 'प्रोजेक्ट स्टिचिंग होप' नाम की परियोजना शुरू की। इसमें 'वन मिलियन हीरोज' समूह ने सहयोग किया। मनीष और उनकी टीम ने राहत शिविरों में महिलाओं को गुड़िया बनाने का प्रशिक्षण दिया। इन गुड़ियाओं के डिजाइन कुत्ता, बिल्ली, बाघ और भालू जैसे पशुओं के रूप में हैं। साथ ही राधा और कृष्ण की गुड़िया भी बनाई जा रही हैं। मोनिष कहा, यह गुडियां सिर्फ गुड़ियां नहीं हैं। हम मानते हैं कि ये उम्मीद का प्रतीक हैं और कहानी कहने के साधन हैं।
परियोजना प्रबंधक नोमिता निंगथौजम ने कहा, हमने दो स्थानीय प्रशिक्षकों को शामिल किया और अक्तूबर से बिष्णुपुर और कक्किंघ जिलों के राहत शिविरों का दौरा कर प्रभावित महिलाओं को कुछ महीनों तक प्रशिक्षण दिया। वर्तमान में करीब चालीस से अधिक महिलाएं नियमित रूप से गुड़ियाओं को बना रही हैं।
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