राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल
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छह महीने से केवल हस्ताक्षरों को सत्यापन किया जा रहा है: सिब्बल
सिब्बल ने कहा कि मुझे समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा किस आधार पर हुआ? क्या चेयरमैन को सीजेआई को ऐसा पत्र लिखना चाहिए? आतंरिक प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की अपनी है, इसका महाभियोग प्रस्ताव से कोई संबंध नहीं है। अभी तक महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार भी नहीं किया गया है, छह महीने हो गए हैं और केवल हस्ताक्षरों का सत्यापन किया जा रहा है।
सिब्बल ने पूछा कि जब महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया तो इसका सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जांच से क्या संबंध है और यदि इसे स्वीकार भी कर लिया गया है तो भी इसका जांच से क्या संबंध है? जस्टिस यादव ने जो कहा वह सबके सामने है, इसमें कोई संदेह नहीं है। उन्होंने इस पर कोई विवाद नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना था कि क्या उन्हें ऐसा कहना चाहिए था, क्योंकि हमारे अनुसार यह पूरी तरह सांप्रदायिक बयान है। यह भी तय करना था कि क्या उन्हें यह बयान देने के बाद जज की कुर्सी पर बैठना चाहिए।
कपिल सिब्बल ने कहा कि राज्यसभा के सभापति ने न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आंतरिक जांच पर पत्र क्यों नहीं लिखा? तो क्या यह सरकार शेखर यादव को बचाना चाहती है, हमें लगता है कि वे उसे बचाना चाहते हैं। या तो कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी या फिर वे महाभियोग नोटिस में कुछ हस्ताक्षरों को खारिज कर देंगे और प्रस्ताव को खारिज कर देंगे ताकि हम सर्वोच्च न्यायालय जाएं और इसमें समय लगे जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि शेखर यादव 2026 में सेवानिवृत्त हो जाएं।
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कार्यक्रम में दिया था विवादित बयान
जस्टिस यादव पर बीते साल 8 दिसंबर को विहिप के विधि प्रकोष्ठ से जुड़े कार्यक्रम में हिस्सा लेने और इस दौरान मुसलमानों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप है। जस्टिस यादव ने कहा था कि बहुसंख्यकों के अनुसार ही देश चलेगा। यही कानून है। इस दौरान उन पर यह कहने का भी आरोप है कि कठमुल्ले देश के लिए घातक हैं।
जस्टिस यादव के खिलाफ महाभियोग के लिए 55 सांसदों ने दिया था नोटिस
मुस्लिमों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में विपक्ष के 55 सासंदों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया था। पिछले साल 13 दिसंबर के इस प्रस्ताव में जस्टिस यादव पर न्यायिक जीवन के मूल्यों के पुनर्कथन-1997 का उल्लंघन करते हुए समान नागरिक संहिता से जुडे़ सियासी मामलों पर सार्वजनिक बहस में शामिल होने व धर्म विशेष पर आपत्तिजनक टिप्पणी का आरोप है। इसके बाद राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने नोटिस को सुप्रीम कोर्ट के महासचिव के साथ साझा करने का निर्देश दिया था।