सूरत भी बेहाल
पांच राज्यों में होने वाले चुनाव को भारतीय जनता पार्टी ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं ने पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और आसाम में अब तक हजारों मीटर के झंडे और बैनर बनवा कर गलियों से लेकर सड़कों तक को पाट दिया है। दरअसल चुनाव से पहले ही झंडे और बैनर के ऑर्डर दे दिए जाते हैं।
देश की प्रमुख पार्टियों को झंडा बैनर सप्लाई करने वाले नितिन अग्रवाल बताते हैं कि वे देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव में औसतन दो से तीन लाख मीटर कपड़े के झंडे और बैनर बनवाते हैं। जबकि उनके जैसे एक दर्जन से ज्यादा व्यापारी ऐसे ही ऑर्डर पर इतना ही काम करते हैं। उन्होंने बताया कि उनके माल की आपूर्ति पश्चिम बंगाल और आसाम में भी हो रही है और वे अब तक इन राज्यों में एक लाख मीटर कपड़े के झंडे और बैनर सप्लाई कर चुके हैं। लेकिन अब वह मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं। अग्रवाल का कहना है ज्यादातर झंडे और बैनर की मांग सत्ता पक्ष के लोगों की ही ओर से की जाती है।
पूरे एशिया के सबसे बड़े टेक्सटाइल हब सूरत की इंडस्ट्री कोरोना काल से ही ढलान पर है। फेडरेशन ऑफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट मनोज अग्रवाल कहते हैं कि निश्चित तौर पर जब चुनाव आता है तो उनकी इंडस्ट्री में कपड़ों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। उनका कहना है सबसे ज्यादा झंडे और बैनर सिंथेटिक कपड़े के बनाए जाते हैं। मनोज अग्रवाल के मुताबिक इस साल भी चुनाव में झंडे और बैनर की मांग बहुत ज्यादा हुई, हालांकि वह यह बात खुलकर कहते हैं कि कोरोना के चलते वह इस बार आपूर्ति पूरी नहीं कर पा रहे हैं।
मनोज कहते हैं दरअसल इस इंडस्ट्री में कोरोना के चलते मैनपावर की जबरदस्त कमी हो रही है। फेडरेशन ऑफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन के मुताबिक उनके पास पांच राज्यों में होने वाले चुनाव में इस्तेमाल किए जाने वाले झंडे-बैनर और अन्य कपड़ों की मांग चुनाव से कुछ महीने पहले ही आने लगी थी। उन्होंने बताया की लेबर की कमी के चलते इस बार बहुत ज्यादा माल का उत्पादन नहीं कर सके हैं। यही वजह है कि जिसने सबसे पहले सबसे ज्यादा आर्डर कर दिया, उसे उसी वक्त माल मिल गया। देरी करने वालों को सप्लाई में दिक्कत हो रही है।
चार करोड़ मीटर रोजाना उत्पादन होता था कपड़े का
फेडरेशन ऑफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक कोरोना से पहले पूरे सूरत में चार करोड़ मीटर प्रतिदिन कपड़ा तैयार होता था। कोविड के दौरान यहां कपड़ा उत्पादन ढाई करोड़ मीटर प्रतिदिन पर सिमट गया। इस वक्त भी पूरे सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री में दो करोड़ मीटर प्रतिदिन ही कपड़े का उत्पादन हो पा रहा है।
एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज बताते हैं कि चुनाव के दौरान तकरीबन 15 से 20 फीसदी उत्पादित कपड़े का इस्तेमाल बैनर-झंडे और दूसरे अन्य चुनावी मैटेरियल के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उनका कहना है कि इस बार भी पांच राज्यों में होने वाले चुनाव के दौरान प्रतिदिन होने वाले दो करोड़ मीटर कपड़े के उत्पादन से 15 से 20 फीसदी की हिस्सेदारी चुनावी राज्यों में होने वाले झंडे-बैनर और अन्य कपड़े के लिए ही हो रही है। एसोसिएशन के मुताबिक चुनाव से दो-तीन महीने पहले ही उनके पास थोक में पूरे देशभर से आर्डर आने लगते हैं।
देश की एक बड़ी पार्टी के नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस बार भारतीय जनता पार्टी की ओर से सबसे ज्यादा झंडे और बैनर तैयार कराए गए। क्योंकि इन सब का हिसाब-किताब चुनाव आयोग रखता है इस वजह से कार्यकर्ताओं की ओर से झंडे बैनर मंगवा लिए गए। यही वजह है कि पांच राज्यों में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत के साथ प्रचार प्रसार के लिए झंडे और बैनर का खूब इस्तेमाल किया।
लेकिन अब अब उन्हें अपनी पार्टी के लिए अतिरिक्त झंडे-बैनरों की जरूरत पड़ी तो उन्हें न तो वक्त पर झंडे मिल पा रहे थे और ना ही बैनर। उन्होंने बताया कि इंडस्ट्री में जब बात की गई तो पता चला कपड़े की कमी है। एक नेता ने बताया कि यही वजह है कि विदेश से खासकर चीन से सिंथेटिक कपड़ा भी आयात किया गया। हालांकि टेक्सटाइल फेडरेशन ने कपड़े की कमी की बात ना कहते हुए मैनपावर की कमी बताई है।