दादी चंद्रो तोमर दुनिया को छोड़कर जरूर चली गई हैं, लेकिन जाते-जाते वह गांव की बेटियों को शूटिंग रेंज का अनोखा तोहफा देकर गई है। काफी समय से उन्होंने जिद ठान रखी थी कि घर की जमीन में रेंज बनवानी है, जिसमें आसपास के गांव की बेटियां और जरूरतमंद आकर शूटिंग कर सकें।
एक से दो माह पहले ही उन्होंने अपनी इस इच्छा को पूरा करने का बीड़ा उठाया और रेंज बनवाना शुरू कर दी। रेंज बनकर तैयार भी हो गई बस इसका उद्घाटन कराना था, लेकिन कोरोना ने दादी के जीते जी उनके इस सपने को पूरा नहीं होने दिया। अब उनके बेटे विनोद तोमर ने मां के सपने को पूरा करने का फैसला लिया है। कोरोना संक्रमण कम होते ही वह रेंज शुरू कराएंगे।
दादी ने दिया बेटियों को घर से बाहर निकलने का हौसला
विनोद के मुताबिक उनकी मां चाहती थीं कि खुद की रेंज होगी तो वह मनमाफिक अंदाज में शूटर तैयार कर सकेंगी और बेटियों को आगे आने का मौका मिलेगा। एक बार स्थितियां ठीक हो जाएं वह रेंज जरूर शुरू कराएंगे।
टोक्यो ओलंपिक में जा रहे एशियन गेम्स गोल्ड मेडलिस्ट शूटर सौरभ चौधरी के कोच अमित श्योराण खुलासा करते हैं कि ये दादी चंद्रो और प्रकाशी तोमर ही थीं जिनको देखकर क्षेत्र के गांववासियों ने अपने बेटियों को घर से निकल शूटिंग रेंज तक जाने की इजाजत दी।
सही मायनों में दादी की बदौलत ही घर से बेटियों को बाहर निकलने का हौसला मिला। माता-पिता को भी लगता था कि दादी साथ में हैं तो बेटियों का भी ध्यान रखेंगी। सही मायनों में होता भी यही था। दादी बेटियों और बच्चों का पूरा ख्याल रखती थीं।
दादी ने शूटिंग में क्षेत्र की बदल दी तस्वीर
अमित खुलासा करते हैं कि 1998 में दादी के गांव ज्योड़ी में एक ही शूटिंग रेंज थी। साल 2000 केआसपास जब दादी ने घर के बच्चों के साथ शूटिंग रेंज में जाना शुरू किया तो इसके बाद स्थिति बदलने लगी। सीमा तोमर, वर्षा तोमर, शेफाली, सर्वेश, रूबी तोमर समेत कई शूटर निकलीं।
यही नहीं इन बेटियों को सरकारी नौकरी भी मिली। आज स्थिति यह है कि पूरे बागपत जिले में तकरीबन 25 शूटिंग रेंज हैं जिनमें ढाई से तीन सौ शूटर प्रैक्टिस कर रहे हैं। इसका श्रेय दादी को ही जाता है।