हनुमान मंदिर के बाहर लोगों को उनके भविष्य की जानकारी देने वाले
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हनुमान मंदिर के बाहर कुर्सी और एक टूटी सी मेज पर ज्योतिष की कुछ किताबें रखकर बैठे बाबा से पूछा तो उन्होंने इस धंधे से जुड़े दूसरे लोगों की ओर इशारा किया जो यह समझा रहे थे कि पहले उनसे पूछ लो। वहां आधा दर्जन से अधिक ऐसे लोग बैठे थे, जो भक्तों का भविष्य बता रहे थे। जब बाबा को हमारे सरकारी अधिकारी न होने भरोसा हो गया, तो खुद को बंगाली बाबा बताते हुए बोले कि दशकों से यहीं बैठता हूं। ये जीवन तो छोड़ो, पिछले जन्म का भी सारा हाल बता दूंगा। फीस 251 रुपये से लेकर 1,100 रुपये तक है।
वहीं सामने बैठे बाबा के प्रतिद्वंदी से पूछा, तो वे बोले कि हाथ देखकर भी आपका भविष्य बता सकते हैं। यह पूछने पर कि हनुमानजी के दर्शन से सब ठीक हो जाएगा। तो वे बोले दर्शन से भविष्य का क्या लेना देना। चुनाव में टिकट से लेकर चेयरमैन की कुर्सी मिलने तक सब वे बता सकते हैं, जिसके लिए कम से कम पांच सौ रुपये फीस देनी होगी। साथ में इस बात की गारंटी कि जो आप चाहेंगे, वैसा ही होगा।
टैटू और मेंहदी लगाने वाले
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यहां टैटू बनवाने का अच्छा खासा क्रेज देखने को मिला। आठ-दस स्टॉल टैटू के लगे हैं और शुरुआत पांच सौ रुपये से लेकर दस हजार रुपये तक है। कीमत टैटू के रंग और उसके जीवनकाल पर निर्भर करती है। साथ ही ग्राहक को यह भी बताया जाता है कि देसी या विदेशी में कौन सा प्रोडेक्ट इस्तेमाल करेंगे। ग्राहकों को कहीं स्टूल पर बैठाया जाता है, तो कहीं ढीली कुर्सियों पर। इनकी भी जगह फिक्स होती है। सुबह आकर यहां झाडू पोछा होता है, फिर काम शुरु होता है। बिजनेस सातों दिन चलता है, वहीं मंगलवार-शनिवार को कमाई का ग्राफ 10 से 20 हजार रुपये तक चला जाता है।
आशा कपूर यहाँ पर पिछले तीस साल से मेहंदी लगाने का काम कर रही हैं।
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यहां पिछले तीस सालों से मेहंदी लगा रहीं आशा कपूर का कहना है कि घर खर्च का बड़ा हिस्सा यहीं से निकलता है। कम से कम रेट सौ रुपये है और अधिकतम दो सौ। यदि किसी को शरीर के दूसरे हिस्सों पर मेहंदी लगवानी है, तो पैकेज के हिसाब से रेट तय होता है। यहां मेहंदी लगाने वाले जितने भी लोग बैठे हैं, उनकी पहले पीढ़ी भी मंदिर के बाहर मेहंदी लगाने का काम करती रही है। वहीं जब भी कोई त्योहार होता है, तो परिवार के दूसरे सदस्य भी काम में मदद करने आ जाते हैं।
मंदिर के बाहर दर्जनभर पुरुष और महिलाएं भक्तों के जूतों की रखवाली करती हैं। लता का कहना है कि हमारा परिवार साठ साल से इसी काम में लगा है। हम यहां सप्ताह में दो दिन मंगलवार और शनिवार को आते हैं। किसी से पैसे मांगते नहीं हैं, लेकिन भक्तगण एक दो जोड़ी जूतों के कम से कम दस रुपये तो दे ही जाते हैं। एक दिन में तीन से पांच हजार रुपये तक जुटा लेते हैं। इससे हमारे बच्चों को अच्छी तालीम मिल पा रही है। घर का खर्च भी यहां से निकल जाता है।
वहीं धर्मबीरी कहती हैं कि हम यहां सातों दिन आते हैं, दो-तीन हजार रुपये बन जाते हैं। वहां जूते सहेजने वालों की तीसरी पीढ़ी तक यही काम कर रही है। जयसिंह बताते हैं, हम जानते हैं कि यह जगह हमारी नहीं है, लेकिन इसे कैसे छोड़ दें। जानते हैं कि बच्चे इस धंधे को आगे नहीं ले जाएंगे, लेकिन जब तक हम हैं तो जूते संभालेंगे ही।