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Supreme Court: 'चौंकाने वाले आदेश से न्यायपालिका पर उठते हैं सवाल', गुजरात मामले की सुनवाई में सुप्रीम टिप्पणी

Fri, 22 May 2026 05:37 PM IST
शिवम गर्ग पीटीआई, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात रेवेन्यू ट्रिब्यूनल मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अदालतों के ‘चौंकाने वाले आदेश’ जनता का न्यायपालिका से भरोसा हिला सकते हैं। जानिए पूरा मामला...
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम सुनवाई के दौरान कहा कि अदालतों द्वारा दिए गए चौंकाने वाले आदेश लोगों के मन में न्यायपालिका को लेकर विश्वास को हिला सकते हैं। कोर्ट की यह टिप्पणी गुजरात रेवेन्यू ट्रिब्यूनल से जुड़े एक विवादित मामले की सुनवाई के दौरान आई। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच गुजरात हाईकोर्ट के सितंबर 2024 के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

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सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गलत आदेश देना एक बात है, लेकिन यदि कोई आदेश बेहद चौंकाने वाला हो, तो उससे आम लोगों का न्यायपालिका पर भरोसा कमजोर पड़ता है। बेंच ने कहा अगर कोई गलत आदेश पारित होता है तो उसे सुधारा जा सकता है, लेकिन जब कोई आदेश न्यायिक विवेक पर सवाल खड़े करे, तो उसका असर न्यायपालिका की साख पर पड़ता है।

हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अवकाश पर भेजने को कहा था
गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि संबंधित अधिकारी को प्रशासनिक अवकाश पर भेजा जाए, जब तक उनके आचरण और फैसलों की समीक्षा पूरी नहीं हो जाती। हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि उसकी टिप्पणियां प्रारंभिक हैं और इन्हें अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
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सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि संबंधित न्यायिक अधिकारी का सेवा रिकॉर्ड बेदाग रहा है और यह मामला केवल मानवीय त्रुटि का परिणाम हो सकता है। वकील ने यह भी दलील दी कि अधिकारी को अदालत में सुनवाई करते समय अचानक पद छोड़ने के लिए कहा गया, जो उचित प्रक्रिया के खिलाफ है।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला गुजरात रेवेन्यू ट्रिब्यूनल के तत्कालीन प्रभारी अध्यक्ष से जुड़ा है। गुजरात हाईकोर्ट ने पाया था कि उन्होंने 2024 में एक ही तरह के मामलों में दो बिल्कुल अलग-अलग आदेश दिए थे, खासकर देरी माफ करने के मुद्दे पर। एक आदेश में 22 साल की देरी को आधार बनाकर राहत देने से इनकार किया गया, जबकि दूसरे मामले में बिना अलग आवेदन के ही देरी को माफ कर दिया गया। हाईकोर्ट ने इन दोनों आदेशों को अस्थिर और टिकाऊ नहीं बताते हुए रद्द कर दिया था।

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