शिवसेना (यूबीटी) ने सामना में कहा कि मोहन भागवत को बंद कमरों में भाषण देने के बजाय उन पीड़ित छात्रों का दर्द बांटना चाहिए जो पुलिस कार्रवाई का शिकार हुए। संघ को पुलिस की कार्रवाई रुकवाकर युवाओं पर दर्ज केस वापस करवाने में मदद करनी चाहिए। सामना में उद्धव ठाकरे ने और क्या-क्या तंज कसा है? जानिए...
नीट-यूजी पेपर लीक विवाद को लेकर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत पर जोरदार हमला बोला है। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में उद्धव ठाकरे ने मुंबई में आयोजित 'संघी-जेन जी' सम्मेलन पर सवाल उठाए गए। इसमें कहा गया कि भाषण देने के बजाय मोहन भागवत को उन छात्रों से मिलना चाहिए था, जिन्होंने नीट आंदोलन के दौरान पुलिस की लाठियां खाई हैं और जिन पर मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
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क्या है पूरा मामला?
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने मुंबई में 'जेन-जी' और 'जेन-अल्फा' के युवाओं के साथ एक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया था। इसमें आरक्षण और दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुए छात्र आंदोलन जैसे मुद्दों पर बात हुई। भागवत ने कहा कि युवाओं की शिकायतें जायज हैं और विरोध प्रदर्शन करने से कोई राष्ट्रविरोधी नहीं बन जाता।
संपादकीय में पूछा गया कि जब युवा 'तानाशाही' के खिलाफ सड़क पर उतरे थे, तब संघ खामोश क्यों रहा? जब दिल्ली में छात्रों पर लाठियां, आंसू गैस के गोले और पैलेट गन का इस्तेमाल किया जा रहा था, तब आरएसएस ने उनका साथ क्यों नहीं दिया?
20 जुलाई को संसद मार्च: कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में नीट पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन चल रहा था। 20 जुलाई को जब प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़े, तो पुलिस कार्रवाई से माहौल हिंसक हो गया।
शिक्षा मंत्री का इस्तीफा: भारी विरोध और छात्र आंदोलन के दबाव में तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था।
झूठे केस वापस लेने की मांग: 'सामना' ने मांग की है कि उपदेश देने के बजाय संघ प्रमुख को युवाओं पर दर्ज पुलिस केसों को खत्म करवाना चाहिए।
क्या संघ परिवार में वैचारिक विरोधाभास?
शिवसेना (यूबीटी) ने भारतीय जनता पार्टी और संघ के बयानों में भारी अंतर होने का दावा किया है। संपादकीय में कहा गया है कि एक तरफ भाजपा अध्यक्ष ने जेन जी युवाओं को 'खतरनाक वायरस' कहा और उन्हें 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' का हिस्सा बताया। दूसरी तरफ, संघ प्रमुख उन्हीं युवाओं से मिलकर कह रहे हैं कि उनके मुद्दे जायज हैं। संपादकीय में तंज कसते हुए लिखा गया कि संघ परिवार के भीतर एक तरह का 'केमिकल लोचा' दिखाई दे रहा है।