फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

उद्धव ठाकरे ने फेरा भाजपा की उम्मीदों पर पानी, शरद पवार बने राजनीति की धुरी

Thu, 28 Nov 2019 09:50 PM IST
अमित मंडल शशिधर पाठक, अमर उजाला

सार

  • क्यों शिवसेना ने लगाया दांव?
  • एनसीपी और कांग्रेस को मिली सत्ता
  • भाजपा को सालती रहेगी तीनों दलों की सरकार
विज्ञापन
शरद पवार और उद्धव ठाकरे - फोटो : ANI
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

शिवसेना ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेरकर महाराष्ट्र की सत्ता पाई है। विधानसभा चुनाव में 105 सीट पाने वाली भाजपा बस देखती रह गई। 10 साल से अधिक समय के जहां शिवसेना ने एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कब्जा जमाया, वहीं महाराष्ट्र की राजनीति में भी अपना दबदबा बना लिया। इससे शिवसेना को मराठा राजनीति में वर्चस्व बनाने में मदद मिलेगी। उद्धव के सहारे सत्ता में भागीदार बनने का गिफ्ट एनसीपी और कांग्रेस को भी मिला है। इससे महाराष्ट्र में शरद पवार जहां राजनीति की धुरी बन गए हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी को राज्य में अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने का अवसर मिल गया है। राजनीति के जानकार मानते हैं कि भाजपा के खाते में केवल पछतावा आया है।

विज्ञापन

 


भाजपा बना सकती थी सरकार

भाजपा के नेता कहते हैं कि वह मुख्यमंत्री पद पर 50-50 का समझौता कर लेते तो उनकी सरकार बननी तय थी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी यही कहते हैं, लेकिन भाजपा ने यह समझौता नहीं किया। इसके उलट भाजपा ने एनसीपी के नेता अजित पवार पर दांव लगाया और महज 80 घंटे के भीतर भाजपा को उल्टे पांव लौटना पड़ा। देवेंद्र फडणवीस की सरकार के गिरने के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी तरफ से सफाई जरूर दी, लेकिन इस दौरान उनकी झेंप साफ दिखाई दे रही थी। भाजपा के नेता भी मानते हैं कि इस पूरे प्रकरण ने जहां भाजपा के भीतर नया चिंतन पैदा कर दिया है, शरद पवार को महाराष्ट्र की राजनीति का सरदार बनने का अवसर भी दे दिया है।

क्यों शिवसेना ने लगाया मुख्यमंत्री पद पर दांव?

बाला साहब ठाकरे के समय से महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री शिवसेना के नेता होते थे। नंबर दो की पार्टी भाजपा होती थी। उद्धव ठाकरे के कमान संभालने के बाद शिवसेना पावर गेम में नंबर दो की और भाजपा नंबर एक की पार्टी बन गई थी। मराठा राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह स्थिति मराठों के लिए अच्छी नहीं मानी जाती। वह हमेशा सत्ता में बने रहना चाहते हैं। बताते हैं इसका असर शिवसेना के महाराष्ट्र की राजनीति में प्रभाव पर पड़ रहा था। इसलिए उद्धव ठाकरे ने पहले भाजपा के सामने 50-50 का प्रस्ताव रखा। भाजपा के इनकार के बाद उद्धव ने काफी कुछ सोच-समझकर कांग्रेस और एनसीपी जैसी विपरीत विचारधारा के साथ जाकर यह निर्णय लेने का जोखिम उठाया। ताकि शिवसेना महाराष्ट्र में अपनी पार्टी का आत्मसम्मान, स्वाभिमान बनाए रखे। इसी के साथ उन्होंने चचेरे भाई राज ठाकरे को भी साथ लाने की पहल की।

विज्ञापन


शरद पवार साबित हुए खिलाड़ी 

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार के बनने के बाद सबसे अधिक शरद पवार ने पाया है। वह मराठा सरदार शरद पवार ही साबित नहीं हुए, बल्कि उनकी राष्ट्रीय छवि भी निखरी है। पवार अपने राजनीतिक दौर के आखिरी पड़ाव पर हैं। ऐसे में एनसीपी का सत्ता में भागीदार होना एनसीपी और शरद पवार दोनों के लिए उपलब्धि है। यही स्थिति कांग्रेस की भी है। कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र में एनसीपी से अधिक सीटें लेकर जीतती रही है, लेकिन पिछले कुछ समय से उसका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है। इससे कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का उत्साह फीका पड़ रहा था। राज्य में सरकार बनने के बाद कांग्रेस पार्टी को भी संजीवनी मिलने की उम्मीद है।

तीनों दलों का कामकाज निखारेगा छवि

उद्धव ठाकरे भले पहली बार बिना विधायक बने मुख्यमंत्री  बने हैं, लेकिन शिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस के पास अनुभवी नेताओं की कमी नहीं है। शरद पवार, अशोक चव्हाण, पृथ्वीराज  चव्हाण, छगन भुजबल जैसे नेताओं की अंगुलियों पर महाराष्ट्र के मुद्दे और समझ है। ऐसे में तीनों दलों की सरकार किसान, मजदूर, युवा समेत अन्य मुद्दों पर अच्छा काम करके इसे अच्छे अवसर में भुना सकती है। धर्मनिरपेक्ष रहकर अपनी पार्टी लाइन को बनाए रखना शिवसेना के लिए जहां चुनौती है, वहीं कट्टर हिन्दुत्व का फ्लेवर देने वाली शिवसेना के साथ तालमेल बनाना एनसीपी, कांग्रेस की भी चुनौती है।

क्या मिला भाजपा को?

महाराष्ट्र की सत्ता पर सबसे बड़ा दल होने के कारण पहला अधिकार भाजपा का है। गठबंधन (भाजपा-शिवसेना) भी भाजपा के नाम पर ही चुनाव जीता, लेकिन सरकार बनाने में नाकामी मिली। राजनीति के जानकार कहते हैं कि भाजपा ने अवसर खोया है और उसे यह अगले कुछ महीने तक सालता रहेगा। इसमें सबसे दु:खदायी पक्ष अजीत पवार का भाजपा के साथ आना और फिर लौट जाना रहा। भाजपा ने सत्ता को लेकर सबकुछ दांव पर लगा दिया और अंत में मजबूरी के कारण खाली हाथ लौट आई। राजनीति के जानकारों का कहना है कि भाजपा की नजर फिलहाल तीनों दलों में बढ़ने वाले टकराव की स्थिति पर टिकी है।
विज्ञापन

 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें