पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों में विवाद हो गया था। लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के आधार पर भाजपा ने ज्यादा सीटें मांगी थी। शिवसेना का मानना था कि दोनों में दशकों से सहमति थी कि लोकसभा चुनाव में भाजपा ज्यादा सीटें लड़ेगी (42 में से 26) और विधानसभा में शिवसेना (288 में से 162) और उन्हें अपने समझौते पर कायम रहना चाहिए।
भाजपा का कहना था कि मोदी लहर के कारण शिवसेना को 22 में से 18 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा को 26 में से 23 सीटें मिलीं। अत: विधानसभा में भी इसी आधार पर सीटों का बंटवारा होना चाहिए। तब समझौता नहीं हो पाया और दोनों दल अलग-अलग लड़े। चुनाव में भाजपा को 122 सीटें मिलीं और शिवसेना को 62। तभी 41 सीटों वाली राकांपा ने सरकार बनाने के लिए भाजपा को समर्थन का एलान कर दिया। शिवसेना को मजबूरन भाजपा के साथ सरकार बनानी पड़ी। शिवसेना यह ‘अपमान’ भुला नहीं पाई और प्रहार भी करती रही और सरकार में हिस्सेदारी भी।
क्या है समझौता
सूत्रों के अनुसार, दोनों दल लोकसभा चुनाव में भाजपा को 26 और शिवसेना को 22 सीटों के बंटवारे पर सहमत हैं। पिछली बार की तरह विधानसभा सीटों के बंटवारे पर असहमति है। शिवसेना की मांग है कि दोनों दलों को 144-144 सीटों पर लड़ना चाहिए। गठबंधन बचाने के लिए भाजपा ने संकेत दिए हैं कि वह इस फॉर्मूले पर सहमत हो सकती है।