दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित यूपी में कांग्रेस का मुख्यमंत्री का चेहरा तो होगी लेकिन वह विधानसभा का चुनाव शायद ही लड़े। पार्टी का तर्क है कि सीएम बनने के लिए पहले चुनाव लडना जरूरी नहीं हैं। इसलिए यह संभव है कि चुनावी रण में वह पार्टी के योद्धाओं को लड़ाएंगी, लड़ेगी नहीं।
राजनीति के अर्श से फर्श पर आ चुकी कांग्रेस यूपी में एक बार फिर पुराने मुकाम को हसिल करने के लिए बेताब है। इसके लिए वह लगातार दांव चल रही है। प्रदेश प्रभारी, प्रदेशाध्यक्ष बदले और सीएम का चेहरा पेश कर प्रचार अभियान समिति और समन्मय समिति के चेयरमैन का जिम्मा तजुर्बेकार नेताओं को सौंपा।
कांग्रेस 2017 में जमीन मजबूत कर उसको 2019 में भुनाना चाहती है। तमाम बदलाव केबीच कांग्रेस हालांकि यह समझ रही है कि सत्ता हासिल करने की स्थिति में फिर भी नहीं आएंगी। पूरी कसरत केबाद विधानसभा सदस्यों की संख्या जरूर बढने की उम्मीद है। पार्टी चाहती है कि लगातार बदलाव से जतना के बीच यह संदेश जरूर दे दिया जाए कि पार्टी भाजपा, सपा और बसपा से कमतर नहीं बल्कि बराबर खड़ी हो ही गई।
इस बीच सीएम का चेहरा पेश करने के बाद भी पार्टी अभी शीला दीक्षित को विधानसभा चुनाव में उतारने का पक्का मन नहीं बना पाई है। दरअसल पार्टी का मानना है कि अगर लाटरी खुल गई और कांग्रेस का सीएम बनने की नौबत आ जाती है तक शीला को किसी भी सीट से अपने सदस्य से इस्तीफा दिलाकर चुनाव लड़ाया जा सकता है या एमएलसी बनाकर जिम्मा सौंपा जा सकता है।
शीला दीक्षित सीएम का चेहरा होने के बाद विदानसभा का चुनाव लड़ने के मुद्दे पर यूपी प्रभारी गुलाम नबी आजाद का साफ कहना है कि किसी सीएम बनने के लिए पहले चुनाव लड़ना जरूरी नहीं है। मुझ समेत कई लोग सीएम बनने के बाद चुनाव लड़े। चुनाव लड़ने से ज्यादा मायने रखता है कि जिस मंजिल को चुना है उसपर कामयाबी हासिल करना जरूरी है।