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...तो फिर चलो लालबत्ती पर... जब सोमनाथ दा ने शरद यादव से कहा 

Mon, 13 Aug 2018 08:15 PM IST
शरद यादव
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सोमनाथ चटर्जी
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हम और दादा (सोमनाथ चटर्जी) साथ-साथ बैठे थे। तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएन शेषन पर चर्चा हो रही थी। अभी हम यह कह ही रहे थे कि चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बनाया जाना बहुत जरूरी है। तभी वहां एक नेता आए और बोले, अरे दादा सीपीआई का एक सांसद लालबत्ती पर इस नई पहल का विरोध कर रहा है। दादा को गुस्सा आ गया है, बोले यह कैसे हो सकता है। ...चलो अभी लालबत्ती पर देखते हैं, कौन विरोध कर रहा है। ऐसे थे सोमनाथ चटर्जी। कोर्ई भी मुद्दा जो आम जन से जुड़ा होता, दादा उस पर बिना कोई देरी किए खड़े हो जाते थे। 
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मैं तो दुबला-पतला जवान 

वे हमेशा मुझे दुबला-पतला सा जवान कहते थे। जब भी मैं उनके सामने (सोमनाथ दा) जाता, चाहे उनके पास कोई भी व्यक्ति बैठा होता, वे मजाकिया अंदाज में झट से मुझे दुबला-पतला सा दाढ़ी वाला कह कर अपने पास बैठा लेते थे। दरअसल, वह बहुत सहज थे। उनका लोगों से मिलने का अपना तरीका था। अब वह हमारे बीच में नहीं है। सोमनाथ दा के चले जाने से भारतीय राजनीति में इतिहास का एक पन्ना मानो हट गया है। उन जैसा सांसद और स्पीकर, बन पाना बहुत मुश्किल है। दादा के सबसे ज्यादा करीबी ज्योति बसु थे। वे उनका बहुत सम्मान करते थे। 

आज खुशी में है या गम में... 

एक बार मैंने रात को खाने पर अपने कुछ मित्रों को बुलाया। मैं और ज्योति बसु जी बैठे थे। दादा आए, बोले आज ये खाना खुशी में है या गम में। दादा के इतना कहते ही वहां का माहौल ठहाकों में बदल गया। उनकी यह त्वरित टिप्पणी राजनीति में पिरोई थी। चूंकि उस वक्त देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बन चुके थे। दादा का तंज भी इसी राजनीतिक डेवलपमेंट पर था। उन्होंने कहा भी... लो धोती वाला बन गया है। 
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दरअसल, मेरे साथ ज्योति बसु जी थे, उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए खूब चला था। दादा भी चाहते थे कि ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री बन जाएं। हमें भी लग रहा था कि ज्योति जी प्रधानमंत्री बन जाएंगे। हालांकि ऐसा नहीं हो पाया। यह दादा के लिए भी दु:खने वाली बात थी, लेकिन उनमें एक बड़ी खूबी और थी। वह हर वातावरण को जीना जानते थे। इसके बाद खुद को समेटते हुए दादा बोले, चलो यार, जो भी हो आज खाना तो खाएंगे ही। 

पैंतीस साल का सानिध्य

मेरी और दादा की मित्रता करीब पैंतीस साल रही। वह बड़ी बेबाकी से अपनी राय व्यक्त करते थे। मैं आपको एक घटना औैर बताता हूं। मेरे साथ नागरिक उड्डयन मंत्री बैठे हुए थे। दादा को भी वहां पर आना था, लेकिन वे थोड़ा सा लेट हो गए। जैसे ही दादा वहां पर आए, कहने लगे जब तक यह इंडियन एयरलाइंस रहेगा, तब तक यूं ही देरी होगी। उन्होंने यह कह कर सार्वजनिक उपक्रमों की दयनीय हालत पर व्यंग्य किया था। 

वे कभी कुछ कहने से हिचकते नहीं थे। बहुत ही स्पष्ट और सटीक तरीके से अपनी बात कहते थे। एक बार अदालत ने सदन को लेकर कुछ आदेश दे दिया। दादा ने उस आदेश पर घोर आपत्ति जताई और बोले, खबरदार। चलो देखते हैं। वह (जज) ऐसे ही आदेश जारी कर देते हैं। यह दादा का एक निराला अंदाज था। सांसद के तौर उन्होंने बिना किसी बनावट के इसी तरह की जिंदगी जी।

(हमारे विशेष संवाददाता जितेन्द्र भारद्वाज से बातचीत पर आधारित) 
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