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स्वतंत्रता दिवस: आजादी की रासायनिक कहानी, आजादी का अहसास शरीर के हार्मोन से जुड़ा है

Mon, 13 Aug 2018 07:54 PM IST
देव प्रकाश चौधरी, अमर उजाला
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azadi
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अगस्त की एक भीगी हुई सुबह, दिल्ली से सटे वैशाली मोहल्ले के एक पार्क में बैठे रिटायर्ड विंग कमांडर रवि मिश्रा जब यह कहते हैं कि ‘हम सबको अपनी ही कल्पना के भारत में रहने की आदत है’तो उनका मकसद आजादी के उस मर्म को बतलाना है, जो हमारे मन में बसता है और जिसकी वजह से हम अपने देश का एक काल्पनिक खाका खींचते हैं। जाहिर है, मन में बसी आजादी ही हमारे कामों और विचारों की दशा-दिशा तय करती है।
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आजादी के सात दशक के बाद भारत इस बात को तो खूबसूरत ढंग से जानता है कि उसे परिवर्तन की राह पर आगे बढ़ने के लिए न तो किसी नारे की जरूरत है और न ही किसी के वादे की। दिल्ली जैसे महानगरों की चौड़ी सड़कों से लेकर जामताड़ा की तंग गलियों तक बदलाव की बयार बह रही है। एक छोटे से घर की फैशनपरस्त लड़की पेरिस के एक भव्य फैशन शो में कैमरे की फ्लैश लाइट्स का सामना कर रही होती है, तो महानगरों में पले, बढ़े और पढ़े एक युवा के दिल में गांव की बंजर जमीन पर बहार लाने का सपना तैर रहा होता है। ये आजाद सोच ही हमें बताती है कि हम बदल रहे हैं। बदलाव की ये यात्रा, जिंदगी में आजादी का सफर भी है।

यह बात अलग है कि अपनी ही कल्पना के भारत में जीने की आदत के साथ, देश के करोड़ों लोगों के लिए आजादी के मायने निश्चित रूप से अलग-अलग हैं। यहां देश की आजादी से लेकर, घुटनों के दर्द से आजादी, किराए से आजादी, असीमित कॉल करने की आजादी, जमकर खरीदारी की आजादी तक सब कुछ है। वैसे आजादी इतना सक्रिय और गतिशील शब्द है कि इसमें समाज-शास्त्र, विज्ञान, धर्म और अध्यात्म तक की झलक मिलने लगती है। अध्यात्म की शुरुआत ही आजादी के इस बिन्दु से होती है कि दूसरों को स्वतंत्र करो, जिससे तुम खुद स्वतंत्र हो सको। ओशो आजादी को समाज की समानता से जोड़कर देखते थे-“स्वतंत्रता है तो समानता के लिए संघर्ष कर सकते हैं लेकिन अगर स्वतंत्रता नहीं है, तो समानता के लिए संघर्ष करने का कोई उपाय आदमी के पास नहीं रह जाता है।”
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लेकिन सामाजिक और अन्य परिस्थितियों से अलग मन में आजादी के जन्म की एक रासायनिक कहानी है। मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक आजादी को शरीर के अंदर के रासायनिक समीकरण और हार्मोन से जोड़कर देखते हैं। एक छोटा बच्चा पहली बार कुछ शब्द बोलता है और वह खुशी से चहकने लगता है। यह खुशी बच्चे को एक अलग तरह की आजादी का अहसास कराती है। एक नौजवान जब अपने करियर की सीढ़ी पर आगे बढ़ते हुए अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है, तो उसे जो खुशी का अहसास होता है, वह भी एक किस्म की आजादी ही है।

शरीर विज्ञान कहता है कि शरीर के अंदर होने वाले कुछ रसायनों की प्रतिक्रिया के कारण हमें आजादी का अहसास होता है और फिर खुशी होती है। जैसे ‘एंडोर्फिन’। यह एक प्रकार से मानवीय शरीर से प्राकृतिक रूप से दुख-दर्द को दूर कर खुशी का अहसास कराने वाला हार्मोन है। शरीर के तंतु कुछ संदेश जब दिमाग तक पहुंचाते हैं तो इस प्रकार शरीर में ‘एंडोर्फिन’ का स्राव बढ़ जाता है और हमें खुशी महसूस होती है। आजादी के अहसास के मामले में भी ऐसा ही होता है। इसी प्रकार ‘सेरोटोनिन’ खुशी का एक प्रमुख केमिकल है। ऐसा ही एक केमिकल है ‘डोपामाइन’। जब हम अपने उद्देश्य की प्राप्ति में सफल होते हैं, तब शरीर में ‘डोपामाइन’ का स्राव बढ़ जाता है। आजादी का भरोसे से बड़ा गहरा नाता है। वहीं, शरीर में ‘ऑक्सीटोसिन’ भरोसे की भावना को जगाता है।

यानी हर किसी के मन में पहले आती है आजादी। दर्शनशास्त्र पर भरोसा करने वालों से पूछें तो वह कहेंगे-“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।” तो जिंदगी में जीत की कहानी भी यहीं से शुरू होती है। बदलाव की बयार भी यहीं से बहती है। आजादी के सात दशक बाद दुनिया के मानचित्र पर भारत की जो रंगीन तस्वीर बनती है, वह लोगों के मन की कूची से ही तो बनती है। यह बात दीगर है कि शुद्ध भोजन, पानी, बुनियादी स्वास्थ्य सेवा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसे कुछ मुद्दे हैं, जिन पर बहुत कुछ होना बाकी है, मगर आजादी की याद हताशा में डूबने के लिए नहीं होती। यह वक्त  कल्पनाशील भविष्य और संभावनाओं की ताकत में निवेश कर, मन को एक लंबी छलांग के लिए तैयार करने का होता है। यह वक्त होता है अपनी कल्पना के भारत की तस्वीर बनाने का।

 
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एक समीकरण आजादी का
डॉ. अजय निहलानी मनोचिकित्सक, भावनाओं का शरीर में होने वाले रसायनिक बदलाव से गहरा संबंध है। जब हमारे मन में खुशी या गर्व की भावना पैदा होती है, तो मस्तिष्क में डोपामाइन और सेरोटोनिन नामक न्यूरो केमिकल्स का उत्सर्जन ज्यादा होने लगता है। इन दोनों रसायनों का जितना ज्यादा उत्सर्जन होता है, हमारे अंदर स्वाभिमान की भावना उतनी ही बढ़ती जाती है। यह स्वाभिमान हमें आजादी का अहसास कराता है।
वहीं, ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन हमें सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करता है। जहां तक पर्व-त्योहार जैसे सामाजिक और सामूहिक क्रिया-कलापों से खुश होने की बात है, तो यह इस पर भी निर्भर करता है कि हमारे लिए इन चीजों का कितना महत्व है। 

जब दूर तक जाती है पतंग

डॉ. भावना बर्मी मनोचिकित्सक, हमारे जहन में चार स्तर पर आजादी बड़ी मायने रखती है। एक शारीरिक स्तर पर, जहां हमें यह महसूस होता है कि हमें कोई रोकने-टोकने वाला नहीं । दूसरा मानसिक स्तर पर, जब हम महसूस करते हैं कि हम कुछ भी सोच सकते हैं और बोल सकते हैं। तीसरा भावानात्मक स्तर पर, जहां हमें लगता है कि हम अपनी भावनाओं को किसी पाबंदी के बिना व्यक्त कर सकते हैं और चौथा अध्यात्मिक स्तर पर, जहां हम किसी भी धर्म को मानने की आजादी महसूस करते हैं। जब यह अहसास हमारे अंदर उत्पन्न होता है कि हम आजाद हैं, तब हमारे मस्तिष्क में एंडोर्फिन नामक हार्मोन उत्पन्न होते हैं। एंडोर्फिन न्यूरोट्रांसमीटर होते हैं, जो सिग्नल्स को एक न्यूरॉन से अगले तक पहुंचाते हैं। इससे सेरोटोनिन केमिकल का स्राव बढ़ता है, जो आपके मूड को बदलने के लिए जिम्मेदार होता है। इसके बढ़ने से आपको गर्व और खुशी का अहसास होता है। जब एक बच्चा पतंग उड़ाता है, तो उसे यही अनुभव होता है। उसके लिए पतंग उड़ाना वह आजादी है, जिसमें उसे रोक-टोक नहीं है। इसलिए जब पतंग दूर तक जाती है, तो उसे आजादी का अहसास होता है और वह खुशी से उछलने लगता है।
 
आजादी में श्री अरविन्द को याद करते हुए- ओशो

श्री अरविन्द से किसी ने एक बार पूछा कि आप भारत की  आजादी के युद्ध में अग्रणी सेनानी थे, लड़ रहे थे, फिर अचानक आप पलायनवादी कैसे हो गए कि सब छोड़कर आप पुडुचेरी में बैठ गए आंख बंद करके। वर्ष में एक बार आप निकलते हैं दर्शन देने को। आप जैसा संघर्षशील और तेजस्वी व्यक्ति जो जीवन के घनेपन में खड़ा था और जीवन को रूपांतरित कर रहा था, वह अचानक इस भांति पलायनवादी होकर अंधेरे में क्यों छिप गया? आप कुछ करते क्यों नहीं? क्या आप सोचते हंै कि करने को कुछ नहीं बचा या करने योग्य कुछ नहीं है? या समाज की और मनुष्य की समस्याएं हल हो गई है और आप विश्राम कर सकते हैं? समस्याएं तो बढ़ती चली जाती हैं। आदमी कष्ट में है, दुःख में  है, गुलाम है, भूखा है, बीमार है, कुछ करिए। श्री अरविन्द ने कहा कि मैं कुछ कर रहा हूं और जो पहले मैं कर रहा  था वह था। अब जो कर रहा हूं वह पर्याप्त है।  वह आदमी चौंका होगा, जिसने पूछा, यह किस प्रकार का करना है कि आप अपने कमरे में आंख बंद किए बैठे हैं, इससे क्या होगा?

तो अरविन्द कहते हैं कि जब मैं करने में लगा था, तब मुझे पता नहीं था कि कर्म तो बहुत ऊपर-ऊपर है, उससे दूसरों को नहीं बदला जा सकता। दूसरों को बदलना हो तो स्वयं के भी अंदर में प्रवेश कर जाना जरूरी है, जहां से कि सूक्ष्म तरंगें उठती हैं और अगर वहां से मैं तरंगों को बदल दूं तो वे तरंगें अनंत तक फैलती चली जाती है। रेडियो की ही आवाज नहीं घूम रही है पृथ्वी के चारों ओर, टेलीविजन के चित्र ही हजारों मील तक नहीं जा रहे हैं, सभी तरंगें अनंत की यात्रा पर निकल जाती हैं। जब आप गहरे में शांत होते हैं तो आपमें झील सी शांत तरंगें उठने लगती हैं। वे शांत तरंगें फैलती चली जाती हैं। वे पृथ्वी को छुएगी, चांद को छुएगी, तारों और ब्रह्मांड में व्याप्त हो जाएंगी। और जितनी सूक्ष्म तरंग का कोई मालिक हो जाए उतना ही दूसरों में प्रवेश करने की क्षमता आ जाती है।
अरविन्द ने कहा कि अब मैं महाकार्य में लगा हूं। तब मैं क्षुद्र कार्य में लगा था। अब मैं उस महाकार्य में लगा हूं, जिसमें मनुष्य से बदलने को कहना न पड़े और बदलाव हो जाए। लेकिन जो व्यक्ति पूछने गया था, वह असंतुष्ट ही लौटा होगा। 

लेकिन भारत की आजादी में अरविन्द का जितना हाथ है, उतना किसी का भी नहीं है। पर वह चरित्र दिखाई नहीं पड़ सकता। आकस्मिक नहीं है कि जिस पंद्रह अगस्त को भारत को आजादी मिली, वह अरविन्द का जन्म दिन है। पर उसे देखना कठिन है। और उसे सिद्ध करना तो बिल्कुल असंभव है। क्योंकि उसको सिद्ध करने का कोई उपाय नहीं है। जो प्रकट स्थूल में नहीं दिखाई पड़ता, उसे सूक्ष्म में सिद्ध करने का भी कोई उपाय नहीं है। भारत की आजादी में अरविन्द का कोई योगदान है, इसे भी लिखने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती। कोई लिखता भी नहीं।  
-'ताओ उपनिषाद' से


 
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