फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शंख घोष: मां की डांट से मैं कवि बना 

Thu, 22 Apr 2021 09:14 AM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
Shankha Ghosh
विज्ञापन

मेरा जन्म चांदपुर में हुआ था, जो ढाका के नजदीक है। चांदपुर मेरा ननिहाल था। मेरा पैतृक घर बरिसाल जिले के मरारीपाड़ा गांव में था। लेकिन मैं पाबना जिले पाकशी में पला-बढ़ा जहां मेरे पिता स्कूल में हेडमास्टर थे। हम आठ भाई-बहन हैं और मैं अपने माता-पिता की चौथी संतान हूं। बचपन में मैं हमेशा दु्र्गापूजा के अवसर गांव जाने का इंतजार करता था। हमारे घर में दुर्गापूजा होती थी। दरअसल गांव के हर घर में दुर्गापूजा होती थी। लेकिन मेरे माता-पिता धार्मिक रूढ़ियों में यकीन नहीं रखते थे। मैं धर्मनिरपेक्ष माहौल में पला-बढ़ा। हालांकि आसपास के माहौल में रूढ़ियां थीं। जैसे स्कूल के ब्राह्मण छात्र गैर ब्राह्मण शिक्षकों के पैर नहीं छूते थे। 

विज्ञापन


पाकशी में एक रेलवे कॉलोनी थी और उसके सामने पद्मा नदी बहती थी। वहां ग्रामीण माहौल था, तो शहर की सुविधाएं भी थीं। दिलचस्प बात यह है कि नौ साल तक पिताजी ने मुझे स्कूल में नहीं डाला था। मेरी उम्र के सभी बच्चे स्कूल जाते थे, लेकिन मैं घर पर रहता था। मुझे नहीं मालूम कि पिताजी ने यह फैसला क्यों लिया था। चूंकि वह रवींद्रनाथ से बेहद प्रभावित थे, शायद इसीलिए स्कूल की चारदीवारी में दी जाने वाली शिक्षा पर बहुत यकीन नहीं करते थे। घर पर ही मेरी पढ़ाई व्यवस्था थी। हालांकि उस व्यवस्था से मुझे लाभ ही हुआ, क्योंकि बचपन में पढ़ते हुए मैंने स्वतंत्रता का भरपूर फायदा उठाया जो बाद के जीवन में मेरे काम आया। हालांकि उसका यह नुकसान हुआ कि छोटी उम्र में वैसा अनुशासित नहीं हो पाया जो स्कूल जाने पर संभव होता। लेकिन स्कूल जाने से पहले ही रवींद्रनाथ का मेरे जीवन और सोच पर प्रभाव पड़ चुका था। 

मई 1941 में, तब रवींद्रनाथ अस्सी साल के हो गए थे, पाकशी के स्कूल में धूमधाम से उनका जन्मदिन समारोह मनाया जा रहा था। स्कूल के छात्र रवींद्रनाथ के नाटक मुक्त धारा का अभिनय कर रहे थे, जबकि मेरे पिता जी उस नाटक का निर्देशन कर रहे थे। मैं तब स्कूल में भर्ती नहीं हुआ था, लेकिन नाटक का रिहर्सल देखने जाता था। चूंकि मैं सब कुछ समझ नहीं पाता था, इसलिए एक दिन मैंने वह नाटक पूरा पढ़ने का फैसला किया। एक दोपहर को मैंने वह पूरा नाटक पड़ डाला, और मैं आपको यकीन नहीं दिला सकता कि उस छोटी सी उम्र में उसके पाठ से मुझे कितनी खुशी हुई थी। उसी दिन से मैं रवींद्रनाथ का अनुयायी बन गया। 
विज्ञापन


रवींद्रनाथ की मृत्यु के बाद उन पर कई संस्मरण छपे, जो मैंने पढ़े। उनमें से दो बहुत महत्वपूर्ण थे। पहला संस्मरण प्रमथनाथ बिशी का था, रवींद्रनाथ ओ शांतिनिकेतन (रवींद्रनाथ और शांतिनिकेतन), जिसमें लेखक ने शांतिनिकेत में बतौर छात्र अपना अनुभव लिपिबद्ध किया था, जबकि दूसरा मैत्रेयी देवी का संस्मरण था, मोनपुरे रवींद्रनाथ (मोनपुर में रवींद्रनाथ)। इन दो संस्मरणों से मैं रवींद्रनाथ को बेहतरह ढंग से समझ पाया। कविता लिखने की ओर झुकाव की भी बेहद दिलचस्प कहानी है। मैं तब बारह साल का रहा होऊंगा। मां एक रात हम दो भाइयों को खाना खिलाते हुए महापुरुषों और 19वीं सदी के चर्चित बंगालियों की कहानियां सुनाते हुए उलाहना दे रही थीं कि हम पूरा दिन ऐसे ही बर्बाद कर देते हैं और कुछ नहीं करते। मुझे उनकी बात चुनौती जैसी लगी। अगले ही दिन बाजार से मैं एक कॉपी खरीद लाया और उसमें कविताएं लिखने लगा। हालांकि वे कविताएं बचकानेपन से भरी थीं, लेकिन वह मेरे लेखन की शुरुआत थी। 
विज्ञापन


 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें