एक वालंटियर का कहना है कि शाहीनबाग में धरना लॉ एंड ऑर्डर से जुड़ा मामला है। यह सीधे प्रशासन के कामकाज से जुड़ता है। सूत्र का कहना है कि देश के नागरिक को सरकार द्वारा बनाए गए किसी कानून या व्यवस्था के विरुद्ध अपना विरोध दर्ज कराने का संवैधानिक अधिकार है।
उच्चतम न्यायालय ने भी इसे स्पष्ट कर दिया है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि वह शाहीन बाग में रहते हैं। केंद्र सरकार को इसे अपनी जिम्मेदारी मानकर पहल करनी चाहिए। वहां जाना चाहिए। लोगों से बात करनी चाहिए। आखिर केंद्र सरकार दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों कर रही है? सूत्र का कहना है कि इससे पहले भी प्रदर्शन हुए हैं। केंद्र सरकार ने प्रदर्शनकारियों को मनाने, उनसे बातचीत की पहल की है।
पास में है पार्क, वहां चली जाएं धरना देने वाली महिलाएं
वार्ताकारों के पास शाहीन बाग के धरने को लेकर कई तरह के प्रस्ताव पहुंचने शुरू हो गए हैं। प्रस्ताव और एक विचार यह भी है कि शाहीनबाग के प्रदर्शनकारी पास में स्थिति एक पार्क में चले जाएं। वार्ताकारों ने भी दूसरे दिन इस तरह की कोशिश की। उन्होंने प्रयास किया कि महिलाएं मान जाएं। वह सड़क से हटक दूसरे स्थान पर चले जाएं। लेकिन धरना दे रही महिलाओं के साथ अभी इस विकल्प पर सहमति नहीं बन पा रही है।
शाहीनबाग का प्रदर्शन दो लोगों को बहुत परेशान कर रहा है। एक वह लोग, परिवार हैं, जिनकी उस सड़क पर दुकानें हैं। 15 दिसंबर के बाद से बंद हैं। तमाम दुकानों का कारोबार पूरी तरह से ठप है। दूसरे कामकाजी लोग हैं। कामकाजी लोग इसी रास्ते से ड्यूटी जाते हैं।
मोटरसाइकिल, स्कूटर सवार तमाम लोग जान जोखिम में रखकर एक संकरा वैकल्पिक रास्ता तलाश लिए हैं, लेकिन इससे भी उनकी परेशानी बनी हुई है। बच्चे स्कूल जाते हैं। स्कूल की बसें बच्चों को लेकर आती-जाती हैं। एक अन्य वर्ग भी है जो दूसरे स्थानों इस सड़क पर आता जाता रहा है।
उसे लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है और ट्रैफिक जाम से जूझ रहा है। बताते हैं यही लोग अदालत में याचिका दायर करके शाहीन बाग का धरना खत्म कराने का प्रयास कर रहे हैं। इन लोगों की परेशानी को उच्चतम न्यायालय भी समझ रहा है और नियुक्त वार्ताकार पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह, वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन भी।