वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने छह दिसंबर को सीजेआई को संबोधित एक खुला पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने मामलों को सूचीबद्ध करने और उन्हें शीर्ष अदालत की अन्य पीठों को फिर से आवंटित करने से संबंधित कुछ घटनाओं पर नाराजगी जताई थी। दवे ने पत्र में तत्काल सुधारात्मक उपाय करने की मांग की थी।
दुष्यंत दवे का नाम लिए बिना बीसीआई प्रमुख ने कहा कि इस तरह के पत्रों के माध्यम से किए गए प्रयास स्पष्ट रूप से अवमाननापूर्ण आचरण और गोपनीय उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए की गई शरारत है और इनसे सख्ती से निपटा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'यह पत्र कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह हैंडबुक की एक क्लासिक चाल है, जिसे हाल के दिनों में भारत के लगभग हर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष बार-बार आजमाया गया है। इस तरह के पत्र स्वतंत्र न्यायिक प्रणाली के कामकाज में अनुचित प्रभाव और दबाव पैदा करने का एक अतिरिक्त-न्यायिक तंत्र है।'
सीजेआई को लिखे पत्र में मनन मिश्रा ने आगे कहा, पत्र में किए गए दावे बिना किसी सच्चाई के सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए हैं और पूरी तरह से किसी भी वास्तविक उद्देश्य से रहित हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के पत्रों के पीछे का उद्देश्य न्यायपालिका पर अपने प्रभावशाली ग्राहकों और हितों के लिए अनुकूल फैसले लेने के लिए दबाव डालना है। इसलिए इस तरह के पत्रों को खारिज कर दिया जाना चाहिए।