जब अंग्रेज ही चले गए तो उनके कानून का क्या फायदा
इससे पहले एनसीपी नेता शरद पवार ने इस कानून बाबत कहा, यह कानून विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों द्वारा लाया गया था। इस काले कानून के तहत, सरकार किसी के भी खिलाफ आरोप लगा सकती है। केस दर्ज होते ही लोगों को जेल भेजा जा सकता है। पवार ने कहा, जब अंग्रेज ही चले गए हैं, तो उनके कानून का क्या फायदा। हैरानी की बात है कि वह कानून आज भी बना हुआ है। आज देश के पास अपनी ताकत है। नागरिकों को अपने सवालों के लिए सरकार का विरोध करने का अधिकार है। इस कानून को अब बदला जाना चाहिए। देशद्रोह के कानून को लगातार बदलने की जरूरत है। केंद्र सरकार, पहले इस राजद्रोह कानून को निरस्त नहीं करना चाहती थी। सुप्रीम कोर्ट का रुख भांपने के बाद केंद्र सरकार ने कहा, वह इस कानून पर पुनर्विचार करेगी। यह बदलाव सकारात्मक है। इस कानून के सख्त प्रावधानों को बदलने की जरूरत है, इस पर संसद में भी चर्चा हो चुकी है।
अंग्रेजों का ये हथियार पूरी तरह से खत्म नहीं हो सकता
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील पवन दुग्गल ने मंगलवार को कहा था कि अंग्रेजों का ये हथियार पूरी तरह से खत्म नहीं हो सकता। देश के खिलाफ काम कर रही ताकतों के लिए ये कानून जरूरी है, लेकिन सरकार को इसके प्रावधानों बाबत दोबारा से विश्लेषण करना चाहिए। इसकी कुछ एप्लीकेशन को सीमित करना होगा। चेक एंड बैलेंस रखना बहुत जरुरी है। 'देशद्रोह' कानून के नए पैरामीटर तय करने होंगे। दुग्गल ने कहा था कि सरकार को यह प्रावधान करना चाहिए कि इस कानून का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी। इससे पुलिस एवं दूसरी जांच एजेंसियां, इसके दुरुपयोग करने से बचेंगी। इस कानून की धारा लगाने से पहले पुलिस कर्मी दस बार सोचेगा। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में जब देशद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी तो केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने कहा, हमने देशद्रोह कानून को लेकर एक प्रस्ताव तैयार किया है। हम एक संज्ञेय अपराध को नहीं रोक सकते, जो किया जाएगा। प्रस्ताव में यह भी शामिल है कि देशद्रोह कानून के तहत केस तभी दर्ज हो, जब एसपी स्तर के अधिकारी या उससे ऊपर के अधिकारी को लगता है कि देशद्रोह का आरोप लगाया जाना चाहिए।
कई बार जल्दबाजी में केस तो दर्ज हो जाता है, लेकिन
पिछले चार-पांच वर्षों के दौरान देशद्रोह या राजद्रोह के केसों की संख्या बढ़ती जा रही है। 2014 में देशद्रोह के 47 केस दर्ज हुए थे, वहीं 2018 में यह आंकड़ा 70 पर पहुंच गया, जबकि 2019 में ऐसे केसों की संख्या 93 रही है। वर्ष 2019 की बात करें तो ऐसे केसों में दोषसिद्धि दर महज 3.3 फीसदी रही थी। 2020 में देशद्रोह के 73 नए केस दर्ज किए गए। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता पवन दुग्गल बताते हैं, ऐसे मामलों में इलेक्ट्रॉनिक सबूत जुटाने होते हैं। कई बार जल्दबाजी में केस तो दर्ज हो जाता है, मगर बाद में उसे अंजाम तक पहुंचाना मुश्किल होता है। पुलिस या जांच एजेंसी, कोर्ट के समक्ष आरोप साबित नहीं कर पाती। नतीजा, बाद में केस खत्म हो जाता है। टूलकिट केस की जांच में ऐसा हो चुका है। देशद्रोह कानून का इस्तेमाल एक टूल के तौर पर न किया जाए। कई बार ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं कि राजनीतिक विरोधियों व आलोचकों पर इसका प्रयोग किया जा रहा है, वह बिल्कुल गलत है। इस कानून के जरिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं होना चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष केंद्र सरकार ने इस कानून की समीक्षा की बात कही है। उम्मीद है कि सरकार इसे वह रूप प्रदान करने में सक्षम होगी कि जिससे केवल वही व्यक्ति डरे, जिसने वैसा अपराध किया है।